उत्तराखंड में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाना रिस्की, मैगी नूडल्स की जांच की भी नहीं व्यवस्था


Gujhiyaनवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य में त्योहार राज्य वासियों के स्वास्थ्य पर भारी न पड़ जाए। राज्यवासी होली दिवाली या आम दिनों में गुझिया-मिठाई सहित कुछ भी खाएें तो अपने रिस्क पर। इसमें पूरा जोखिम उनका स्वयं का होगा। राज्य के इकलौते रुद्रपुर स्थित फूड एंड ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी यानी खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला में पिछली होलियों तक एक भी खाद्य विश्लेषक नहीं था। हमारे द्वारा समाचार प्रकाशित किये जाने के बाद इधर बमुश्किल एक खाद्य विश्लेषक की तैनाती की गयी है, जो भी नाकाफी साबित हो रही है। ऐसे में पिछले सितंबर (2014) माह से राज्य में खाद्य पदार्थों एवं औषधियों के जो भी नमूने लिए जा रहे हैं, वह जांच के बिना ही प्रयोगशाला से बैरंग वापस आ रहे हैं। ऐसे में खाद्य सुरक्षा से जुड़े अधिकारी होली पर किसी तरह की छापेमारी करने से ही बच रहे हैं। होली के त्योहार में राज्य में एक जगह भी खाद्य पदार्थों की छापेमारी नहीं की गई।

गौरतलब है कि होली एवं दीपावली के बड़े त्योहारों पर लोग मिठाइयों का खूब आदान-प्रदान करते हैं। खासकर होली पर बाजार से खोया लाकर घर-घर में गुझिया बनाई जाती हैं। खोया में मिलावट किसी से छुपी नहीं है। बीते वर्षों में खोया में रसायनिक तत्वों के साथ ही जानवरों की चरबी तक की मिलावट की खबरें आती रही हैं। पूर्व में राज्य के खाद्य नमूने पूर्ववर्ती राज्य यूपी भेजे जाते थे, लेकिन रुद्रपुर में राज्य की अपनी प्रयोगशाला बनने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि राज्य में खाद्य सुरक्षा का स्तर सुधरेगा। लेकिन इससे व्यवस्थाएं सुधरने के बजाय और बदतर हो गई हैं। अब नमूनों को यूपी भेजने की व्यवस्था भी ध्वस्त हो चुकी है,और अपनी प्रयोगशाला में उपकरण खाद्य विश्लेषक की तैनाती न होने के कारण जंग खा रहे हैं। स्थितियों को स्वीकार करते हुए मुख्यालय के खाद्य सुरक्षा अभिहीत अधिकारी राजेंद्र रावत ने कहा कि खाद्य विश्लेषक की तैनाती और खाद्य नमूनों की जांच पर निर्णय शासन स्तर पर लंबित है, इसलिए वह कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हैं।

इधर, रुद्रपुर में स्थापित राज्य खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला में पिछले चार साल से विश्लेषकों और सहायकों के करीब डेढ़ दर्जन पद खाली हैं। हाल में उठे मैगी विवाद के बाद नई मुश्किल खड़ी हो गई है। लैब में जितने सैंपल आ रहे हैं, मौजूदा स्टाफ के लिए उनका समय से परीक्षण संभव नहीं है। मैगी विवाद से पहले पूरे साल में लैब के पास महज 100 खाद्य नमूने ही आते थे, वहीं मैगी विवाद के बाद मई जून में उसे मिलने वाले खाद्य नमूनों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हो गई है। आलम यह है कि कई दिन तो लैब को एक दिन में ही 100 से 150 खाद्य नमूने आ रहे हैं। पिछले दो महीनों में अकेले मैगी के ही 70 से ज्यादा नमूने लैब को मिले। लैब के एक मात्र खाद्य विश्लेषक सचिन शर्मा का कहना है कि मैगी के अकेले पैकेट के परीक्षण में ही 10 दिन का समय लगता है, लेकिन लैब को अब कई और खाद्य पदार्थो के नमूने परीक्षण के लिए मिल रहे हैं जो कि प्रयोगशाला के लिए बहुत कठिन काम है। चार जून 2015 के बाद ही खाद्य सुरक्षा विभाग ने लैब को नूडल्स, पास्ता आदि के 40 से ज्यादा नमूने परीक्षण के लिए भेजे थे। खाद्य सुरक्षा अधिकारी राजेंद्र रावत का कहना है कि मई में काफी ज्यादा खाद्य पदार्थो के नमूने लैब को भेजे गए। बहरहाल दिक्कत यह है कि प्रयोगशाला में स्टाफ की भारी कमी है। लैब में केवल छह विश्लेषक हैं। जबकि विश्लेषकों व सहायक कर्मचारियों के 17 पद पिछले चार साल से खाली हैं। ऐसे में खाद्य पदार्थो के नमूनों की जांच बहुत मुश्किल से हो रही है। दिक्कत यह है कि खाद्य सुरक्षा विभाग खुद बाहर से विश्लेषकों की मदद भी नहीं ले सकता क्योंकि चिकित्सा स्वास्य एवं परिवार कल्याण महानिदेशक ही इस बाबत फैसला ले सकते हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग हालांकि कई बार महानिदेशक से इस बाबत आवेदन कर चुका है। प्रदेश में करीब 6500 पंजीकृत खाद्य उत्पाद इकाइयां हैं। जबकि इतने ही व्यवसायी बिना पंजीकरण के काम करते हैं। लंबे समय से गढ़वाल क्षेत्र में भी खाद्य एवं औषधि परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करने की मांग हो रहीहै लेकिन अब तक इस बाबत कोई ठोस फैसला नहीं हो पाया है।न

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