कामयाबी: देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन ‘डॉट’ स्थापित, आइएलएमटी की तैयारी


Rashtriya Sahara 24 April 15

Rashtriya Sahara 24 April 15

-सफलता से लिए गए शनि व बृहस्पति के प्रारंभिक प्रेक्षण नवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, देश ही नहीं एशिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन-डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप जनपद के देवस्थल नाम के स्थान पर स्थापित हो गई है। इस दूरबीन से प्रायोगिक तौर पर शनि एवं बृहस्पति ग्रहों के चित्र सफलता पूर्वक ले लिए गए हैं। इसे तेजी से अंतरिक्ष, ब्रह्मांड व विज्ञान जगत में लगातार आगे बढ़ रहे देश के लिए बड़ा कदम माना जा सकता है। दूरबीन का औपचारिक तौर पर शुभारंभ इस वर्ष अक्टूबर माह में होने की उम्मीद है।

देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन।
देवस्थल में स्थापित 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन।

उल्लेखनीय है कि देवस्थल के प्रदूषण मुक्त साफ-स्वच्छ वायुमंडल में डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप के निर्माण की प्रक्रिया वर्ष 1998 से चल रही है। इधर 28-29 अक्टूबर 2014 से इस दूरबीन को स्थापित करने की प्रक्रिया वेल्जियम एवं एरीज के वैज्ञानिकों की टीम के द्वारा कई चरणों में चल रही थी, जो कि अब पूर्ण हो गई है। एरीज के कार्यकारी निदेशक डा. वहाब उद्दीन ने बताया कि दूरबीन के इलेक्ट्रिक, इलेक्ट्रोनिक्स, मैकेनिकल, ऑप्टिकल व सिविल के समस्त कार्य पूर्ण हो गए हैं। इसके बाद एरीज की पूरी टीम इसके परीक्षणों एवं क्षमता को मांपने में लग गए हैं।

कई मायनों में अनूठी है ‘डॉट’

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देवस्थल में स्थापित दूरबीन से लिया गया छल्लों युक्त बृहस्पति ग्रह का चित्र।
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देवस्थल में स्थापित दूरबीन से लिया गया शनि ग्रह का चित्र।

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि भारत की अब तक सबसे बड़ी 2.3 मीटर व्यास की दूरबीन माउंट कगलूर (कर्नाटक) में है, जबकि एशिया की सबसे बड़ी चार मीटर व्यास की दूरबीन-लेमोस्ट चाइना वर्ष 2012 में चीन में स्थापित की गई है। लेकिन चीन व भारत की दूरबीन में फर्क यह है कि चीन की मोजेक यानी अनेक छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनी दूरबीन स्टेटिक है। यानी यह बिना हिले-डुले केवल एक स्थान पर ही प्रेक्षण कर सकती है। जबकि भारत की दूरबीन में 3.6 मीटर व्यास का एशिया का सही मायनों में सबसे बड़े व्यास का इकलौता लेंस लगा हुआ है, और यह पूरे 360 डिग्री के कोण पर घूमते हुए पूरे ब्रह्मांड के दर्शन करा सकती हैं। इस हेतु दूरबीन में कक्ष के भीतर ही गुंबद में 10 टन के भार को उठाने की क्षमता युक्त चार ऐसी क्रेनें भी लगी हुई हैं, जो न्यूनतम तीन मिमी प्रति सेकेंड जैसी धीमी गति से लेंस को बिना झटका दिए घुमाती है। इस तरह भारतीय दूरबीन अपनी तरह की सबसे बड़ी ‘जनरल पर्पज” दूरबीन है। इस स्टेलर दूरबीन का शीशा केवल 16.5 सेमी ही मोटा है । इस प्रकार यह मोटाई और व्यास के अनुपात (व्यास व मोटाई में 10 का अनुपात) में दुनिया में अद्वितीय बताई जा रही है। इस दूरबीन की महत्ता इसलिए भी है कि पूर्व में आस्ट्रेलिया से करीब 12 घंटे समय की दूरी पर पश्चिम में स्पेन के पास स्थित केनरी आइलेंड के करीब बीचों-बीच यह स्थापित हुई है, लिहाजा इससे 12 घंटे के समय अंतराल के बीच ब्रह्मांड में होने वाली सुपर नोवा, गामा किरणों के रिबस्र्ट आदि हर तरह की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है, साथ ही ब्रह्मांड में संभव पृथ्वी जैसे अनय ग्रहों की पहचान, पृथ्वी पर टकरा सकने वाले एस्ट्राइड, सुदूर अंतरिक्ष में जगमगाने वाले सितारों व अपनी ‘मिल्की-वे” के साथ ही आस-पास की अनेक कम प्रकाश वाली धुंधली आकाशगंगाओं व तारों के वर्णक्रम को भी देखा एवं उनका सूक्ष्म अध्ययन भी किया जा सकेगा। साथ ही पृथ्वी को एक्स-रेज से नुकसान पहुंचा सकने वाले गामा बस्र्ट आदि पर नजर रखी जा सकती है। समुद्र सतह से करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर एवं आसपास चार-पांच किमी के हवाई दायरे में कोई प्रकाश प्रदूषण न होने की वजह से भी डॉट न केवल देश, वरन दुनिया के खगोल वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देवस्थल से प्राप्त ब्रह्मांड के चित्र यहां के दिन में नीले और रात्रि में गाढ़े अंधेरे (आसपास रोशनी न होने के कारण) के कारण इतने साफ और सटीक हैं कि देवस्थल सीधे ही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खगोल वैज्ञानिक केंद्रों में शामिल हो गया है। इस कारण बेल्जियम सहित दुनिया के अन्य देश तथा भारत के टीआईएफआर, आयुका व आईआईए बंगलुरु आदि बड़े संस्थान भी यहां अपने उपकरण लगा रहे हैं।

इसके जरिए भारत ने बढ़ाई हैं अपनी कई क्षमताएं

नैनीताल। डॉट के जरिए भारत ने देश में पहली बार 3.7 व्यास के बड़े लेंसों पर एल्युमिनियम कोटिंग (परत चढ़ाने) की क्षमता विकसित की है। एरीज के सहयोग से यह क्षमता एचएचपी बंगलुरू द्वारा विकसित की गई है। इस क्षमता का प्रयोग भारत आगे विश्व की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास की टीएमटी में भी कर रहा है, तथा आगे अपनी प्रस्तावित 10 मीटर व्यास की व अन्य बड़ी दूरबीनों में भी कर सकेगा। प्रोजेक्ट मैनेजर डा. बृजेश कुमार ने बताया कि दूरबीन के निर्माण में लेंस के निर्माण को छोड़कर तथा कोटिंग व स्थापन सहित 50 फीसद कार्य अपने देश में किए गए हैं, जो अपने आप में देश के लिए एक बड़ी सफलता व गर्व की बात है।

वर्ष 2007 की ही कीमत पर हुआ है निर्माण

नैनीताल। डॉट के प्रोजेक्ट मैनेजर डा. बृजेश कुमार ने बताया कि इस दूरबीन के लिए टेंडरिंग की प्रक्रिया वर्ष 2007 में शुरू हुई थी। तब इसकी लागत 17.5 मिलियन यूरो यानी करीब 100 करोड़ रुपए तय हुई थी। इसमें से भी दो यूरो यानी करीब 10 करोड़ रुपए इसके लिए लेंस का निर्माण करने वाले बेल्जियम द्वारा दिए गए थे। बताया कि 2007 की तय लागत में ही दूरबीन का पूरा निर्माण कर लिया गया है। इसकी करीब 30 मीटर ऊंची 10 मंजिला इमारत का निर्माण केवल करीब सात करोड़ रुपए में किया गया है, जिसमें शाम ढलने के बाद भीतर और बाहर का तापमान समान रहने जैसी विशेषता भी है।

एरीज-देवस्थल के सिर एक और ताज: विश्व की अनूठी चार मीटर व्यास की आईएलएमटी दूरबीन होगी स्थापित

4 मीटर आइएलएमटी
4 मीटर आइएलएमटी

-भारत-बेल्जियम की संयुक्त परियोजना में अगले वर्ष इस दूरबीन के शुरू हो जाने का वैज्ञानिकों को है भरोसा
-आकाश के सर्वोच्च शिखर-जेनिथ की आधे अंश की पट्टी का स्थैतिक रहकर करेगी यह दूरबीन अध्ययन
-विश्व में अभी ऐसी दूरबीन कहीं भी नहीं, बैंकुवर में स्थापित दूरबीन हो चुकी है कालातीत
-परंपरागत लेंस की दूरबीन से 50 गुना होगी सस्ती
नवीन जोशी, नैनीताल। स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के तहत ‘बेल्गो-इंडियन नेटवर्क फॉर एस्ट्रनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स यानी बिना’ के द्वारा नैनीताल जनपद के देवस्थल नाम के स्थान पर विश्व की अनूठी 4 मीटर व्यास की दूरबीन स्थापित होने जा रही है। मंगलवार को इस दूरबीन के स्थापित होने का खुलासा हुआ, किंतु इसके निर्माण के लिये देवस्थल में गुंबद आदि का निर्माण हो चुका है, तथा अप्रैल 2017 में इस गुंबद में दूरबीन की स्थापना हो जाने की भारत व बेल्जियम के प्रोजेक्ट इंजीनियरों ने पूरी उम्मीद जाहिर की है। उल्लेखनीय है देवस्थल में इसी वर्ष भारत ही नहीं एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन डॉट यानी देवस्थल ऑप्टिलक टेलीस्कोप का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम से किया था, जबकि आगे स्थापित होने जा रही दूरबीन इससे भी बड़े 4 मीटर व्यास की होगी।
देवस्थल में स्थापित होने जा रही 4 मीटर व्यास की दूरबीन के प्रोजेक्ट इंजीनियर, एरीज के वैज्ञानिक डा. एके पांडे व बेल्जियम के प्रोजेक्ट इंजीनियर लिट्जे यूनिवर्सिटी बेल्जियम के स्टार इंस्टिट्यूट के जीन सरडेज ने बताया कि प्रस्तावित दूरबीन इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप-आईएलएमटी यानी तरल लेंस से निर्मित होगी। देवस्थल में मौजूद डॉट जहां बेल्जियम में ही बने 3.6 मीटर व्यास के एक शीशे से बनी है, वहीं प्रस्तावित दूरबीन चार मीटर व्यास के धातु के कटोरेनुमा ढांचे पर पारे को चढ़ाकर बने हुए लेंस से निर्मित होगी। बावजूद इसकी चमक और परावर्तन यानी शीशे की तरह दूसरी वस्तुओं-तारों आदि को देखने की क्षमता परंपरागत लेंस जैसी ही होगी। इस प्रकार इसकी कीमत डॉट के मुकाबले 50 गुना तक कम होगी। अलबत्ता, यह डॉट की तरह पूरे आसमान में घूम कर प्रेक्षण व अध्ययन नहीं कर सकती, किंतु इससे जेनिथ कहे जाने वाले आकाश के सर्वोच्च शिखर की धरती से आधे डिग्री के कोण की पट्टी का बहुत बेहतरी से अध्ययन किया जा सकेगा। अलबत्ता इसका जीवनकाल पांच वर्ष ही होगा। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस तकनीकी की एक 6 मीटर व्यास की दूरबीन बैंकुवर कनाडा में स्थापित की गई थी, जोकि अब कालातीत हो चुकी है। यानी देवस्थल में स्थापित होने जा रही दूरबीन अपनी तरह की विश्व की अनूठी व बड़ी दूरबीन होगी। वैज्ञानिकों ने बताया कि वैज्ञानिकों ने 20 वर्ष के अध्ययन के बाद देवस्थल का चयन डॉट एवं इस आईएलएमटी दूरबीन की स्थापना के लिये किया है।

दो वर्ष से एरीज पर बिना मुखिया बड़ी जिम्मेदारियों का बोझ

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राष्ट्रीय सहारा, 25 अप्रेल, 2015

-मई 2013 में आरोपों के बाद छीन लिए थे तत्कालीन निदेशक प्रो. रामसागर से अधिकार
-तभी से कार्यकारी व्यवस्था में चल रहा है देश का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोध संस्थान
-एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन के अलावा एसटी रडार लगाने जैसे बड़े प्रोजेक्टों की भी है जिम्मेदारी
नवीन जोशी, नैनीताल। आजादी के बाद खगोल विज्ञान प्रेमी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री संपूर्णानंद द्वारा देखे गए स्वप्न के फलस्वरूप अस्तित्व में आए देश के शीर्ष वैज्ञानिक शोध संस्थानों में शुमार एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वर्ष से ‘अच्छे दिन” नहीं आ पा रहे हैं। संस्थान पर एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन के साथ ही प्रदेश को दैवीय आपदाओं से बचाने के लिए मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए जरूरी एसटी रडार स्थापित करने जैसे बड़े प्रोजेक्टों की जिम्मेदारी है, लेकिन मई 2013 में तत्कालीन निदेशक प्रो. रामसागर पर आरोप लगने के कारण छीन ली गई जिम्मेदारियों के बाद से मुखिया यानी स्थाई निदेशक नहीं है। समझा जा सकता है कि निदेशक न होने की वजह से संस्थान के दैनंदिन क्रियाकलापों के साथ ही बड़े प्रोजेक्टों हेतु लिए जाने वाले निर्णयों में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि यूपी के तत्कालीन सीएम संपूर्णानंद ने सर्वप्रथम 1951 में राजकीय वेधशाला बनाने का निर्णय लिया था। 20 अप्रैल 1954 में यह नैनीताल के नाम पर बनारस गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज के एक कक्ष में स्थापित की गई, तथा डीएसबी कॉलेज नैनीताल के डा. एएन सिंह को इसका निदेशक बनाया गया। जुलाई 54 में ही उनका हृदयाघात से निधन हो जाने के बाद नवंबर 1954 में डा. एमके वेणुबप्पू इसके निदेशक बनाए गए, जिन्होंने इसकी नैनीताल के पहाड़ों पर स्थापना की पूर्व योजना के अनुरूप इसे पहले नैनीताल के देवी लॉज में तथा बाद में वर्तमान 1951 मीटर ऊंचाई वाली मनोरा पीक चोटी में स्थापित करवाया। आगे डा. केडी सिंभ्वल 1960 से 1978, डा. एमसी पांडे 78 से बीच में कुछ अवधि छोड़कर 1994 तक इसके निदेशक रहे, तथा जुलाई 1996 में प्रो. रामसागर इसके निदेशक बने। मई 2013 में आरोप लगने एवं मामला सीबीआई तक जाने जैसी स्थितियों में उनसे पहले शक्तियां छीनी गर्इं, तथा बाद में पद से हटा दिया गया, और तभी से पहले कुछ समय डा. एके पांडे और बाद में जून 2013 से वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन इसकी बतौर कार्यकारी निदेशक जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इधर जहां वरिष्ठ भूवैज्ञानिक प्रो. केएस वल्दिया ने जहां देश के अनेक वैज्ञानिक संस्थानों में निदेशकों-महानिदेशकों की नियुक्ति न होने पर सवाल उठाए थे, वहीं एरीज के गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष डा. एसके जोशी ने भी माना कि पूर्णकालिक निदेशक न होने की वजह से 3.6 मीटर व्यास की दूरबीन की स्थापना में विलंब हुआ है।

शीघ्र काम करना शुरू कर देगी एसटी रडार

एरीज में स्थापित की जा रही एसटी रडार।
एरीज में स्थापित की जा रही एसटी रडार।

नैनीताल। स्थानीय एरीज में देश की सबसे बड़ी 206 मेगा हर्ट्ज क्षमता की एसटी रडार शीघ्र कार्य करने जा रही है। इस रडार से पहाड़ी राज्यों में बादल फटने, तूफान आने सहित वायुयानों के बाबत करीब २४ घंटे पहले तक सटीक भविष्यवाणी हो सकेगी। एरीज के वायुमंडल वैज्ञानिक व एसटी रडार विशेषज्ञ डा. नरेंद्र सिंह ने बताया कि इस रडार के हार्डवेयर से संबंधित सभी 588 एंटीना व इतने ही टीआर मॉड्यूल स्थापित करने संबंधित कार्य पूर्ण हो चुके हैं, और अब डिजिटल सिग्नल प्रोसेसर से संबंधित सॉफ्टवेयर के कार्य पूना की कंपनी के द्वारा किए जा रहे हैं। पूर्व में बंगलुरू की कंपनी से यही कार्य हटाना पड़ा था। डा१ सिंह ने उम्मीद जताई कि इस वर्ष के अंत तक एसटी रडार कार्य करना प्रारंभ कर देगी। यह रडार वायुमंडल में चलने वाली हवाओं के 60 मील यानी 150 किमी प्रति घंटा की गति तक जाने की संभावना का दो दिन पहले ही अंदाजा लगाने की क्षमता रखती है। साथ ही यह धरती के वायुमंडल की करीब 20 से २५ मीटर की ऊंचाई की दिशा में हवाओं की गति पर नजर रखकर बज्रपात, बिजली की गर्जना, वायुयानों के चलने वाली हवाओं के रुख का अनुमान भी 24 घंटों पूर्व लगा सकती है।

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