नैनीताल में फिल्म थिएटर के अन्दर और बाहर ‘मिशन टाइगर’


नरभक्षियों को जिम की तरह मारने नहीं बचाने के लिए मारते थे ‘मिनी कॉर्बेट’ ठाकुर दत्त जोशी भी

-अब तक 20 बाघ व 30 Thakur Datt Joshi (1)गुलदारों को मार तथा 20 को जिंदा दबोच चुके थे ठाकुर दत्त जोशी, 22 दिसंबर 2016 को 82 वर्ष की उम्र में हुआ देहावसान 
-कुमाऊं के आदमखोर व देवी शेर तथा कुमाऊं के अन्य नरभक्षी नाम से पुस्तकें भी लिख चुके हैं कार्बेट टाइगर रिजर्व के पूर्व वाइल्ड लाइफ वार्डन
नवीन जोशी, नैनीताल। जिस तरह जिम कार्बेट की पहचान आदमखोर वन्य जीवों के एक शिकारी के साथ ही एक पर्यावरण व वन्य जीव प्रेमी की भी, करीब-करीब वैसी ही पहचान मिनी कॉर्बेट कहे जाने वाले ठाकुर दत्त जोशी का भी थी, जिनका 22 दिसंबर 2016 को देहावसान हो गया। अब तक 20 बाघ व 30 गुलदारों को मार तथा 20 बाघ-गुलदारों को जिंदा दबोच चुके जोशी ने एक वर्ष पूर्व 04.10.2015 को एक विशेष भेंट में स्वयं के जिम कार्बेट के रूप में आगे बढ़ने की यात्रा साझा की थी। कहते हैं कि वह आदमखोरों को मारने नहीं बचाने के लिए उनका शिकार करते हैं। बहुत सीधे शब्दों में वह इस बात को समझाते हैं-एक बाघ जब नरभक्षी होता है, तो उसके खाने से बचे मांश को दूसरे वन्य जीव भी खा लेते हैं। इससे वे भी नरभक्षी हो जाते हैं। इस प्रकार वे प्रदेश के वन्य जीव प्रतिपालक के आदेशों पर ही ऐसे नरभक्षियों को मारकर अन्य जानवरों को नरभक्षी बनने से भी बचाते हैं। कहते हैं कि किसी बीमारी का उपचार जरूरी है, उन्हें मारना भी एक उपचार है, लेकिन वनों को बचाना इस समस्या का स्थाई समाधान है।
रविवार (बताया था कि वन विभाग में वाइल्ड लाइफ वार्डन के पद पर रहते गश्त के दौरान एक बाघ उनके सामने आकर खड़ा हुआ था, तब उन्होंने बाघ की तरह ही दहाड़कर बाघ को भगा दिया था। कहा कि आम लोग भी कभी ऐसा मौका आने पर यही प्रयोग कर सकते हैं। बताया कि सर्वप्रथम 1975 में एक बाघ को पिंजड़े में फंसाने से उनकी यात्रा शुरू हुई थी, 1984 में पहली बार एक नरभक्षी गुलदार को ढेर किया, तब से यह यात्रा जारी है, तथा अब 80 वर्ष की यात्रा में आकर वह इसे विराम देने की स्थिति में पहुंच गए हैं। बताया कि लखनऊ के कुकरैल सहित यूपी-उत्तराखंड में अनेकों बार वह नरभक्षियों का अंत कर चुके हैं। बताया कि सामान्यतया 315 और कभी 12 बोर की बंदूक भी वह प्रयोग में करते हैं, तथा आदमखोर के शिर की बजाय धड़ वाला हिस्सा उनके निशाने पर रहता है।

कमेट मिट्टी खाने को मजबूर हैं बाघ

नैनीताल। श्री जोशी ने कहा कि हिंसक वन्य जीव तथा वन संपदा भी मनुष्य और मनुष्य के लिए उपयोगी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। पूर्व में वन संपदा एवं हिंसक वन्य जीवों के लिए भोजन प्रचुर मात्रा में था, लेकिन इधर जिम कार्बेट पार्क क्षेत्र बाघों के मुख्य भोजन चीतल व सांभर की संख्या में काफी कमी आई है। पूर्व की तरह मनुष्य भी बकरी आदि पालतू जानवरों को जंगल भेजते थे, इनमें से कुछ का शिकार कर बाघों को भोजन मिल जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। ऐसे में कई बाघ नदी किनारे खास स्थानों पर मिलनी वाली सफेद मिट्टी-कमेट (जिसे पूर्व में लोग चूने की तरह घर को पोतने के लिए प्रयोग करते थे) को भी खाते देखे गए हैं।

‘लाइनेस’ ने किया ‘लायंस के शिकारी’ का सम्मान

Thakur Datt Joshi (2)नैनीताल। रविवार को मिनी कार्बेट कहे जाने वाले ठाकुर दत्त जोशी के लिए यादगार पल थे जब ‘लायनेस’ (शेरनियां) क्लब की ओर से नरभक्षियों के एक शिकारी का सम्मान किया गया। उन्हें लायनेस क्लब की ओर से स्थानीय विधायक व संसदीय सचिव सरिता आर्य तथा नई पदाधिकारी आशा शर्मा ने शॉल ओढ़ाकर तथा पुष्प गुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। इस पर कई लोग चुटकियां भी लेते देखे गए कि ‘लाइनेस’ के द्वारा ‘लायंस के शिकारी’ का सम्मान  किया जा रहा है।

-कैपिटॉल सिनेमा के स्वामी के होटल में सुबह हनीमून मनाने आए नवविवाहित जोड़े के कक्ष में घुसा सवा वर्ष की उम्र का शावक
-बेहद बलिष्ठ था शावक, तीन घंटे बाद पकड़ने की कोशिश में थाना प्रभारी व वन दरोगा को धक्का दे रोशनदान से बाहर निकलकर भागा
-तीन सप्ताह में नगर में वन्य जीवों के आने की दूसरी घटना, इससे पूर्व बीती 10 जुलाई को वयस्क भालू आ घुसा था प्रशांत होटल में
नैनीताल। इधर नैनीताल नगर के कैपिटॉल सिनेमा में सुबह नौ बजे से उत्तराखंड के बाघों के संरक्षण पर बनी फिल्म ‘मिशन टाइगर’ चल रही थी, और उधर सुबह करीब साढ़े चार बजे कैपिटॉल सिनेमा के स्वामी अमित साह के ही तल्लीताल स्थित होटल में वाकई में बाघ प्रजाति के गुलदार का एक शावक घुस गया, और सुबह के करीब तीन घंटे उसकी दहशत के बीच पकड़ने की असफल कोशिशों के साथ ‘मिशन टाइगर’ ही चला। शावक होटल में हनीमून मनाने के लिए आये मेरठ के नवविवाहित युगल के कक्ष में शीशा तोड़कर घुसा। गनीमत रही कि कक्ष में मौजूद अभी मई माह में ही विवाह के उपरांत अपने परिवार के साथ बीती रात्रि ही यहां घूमने पहुंचे मेरठ के पल्लवपुर फेस एक निवासी 24 वर्षीय युवक सुमित ने बेहद हिम्मत का परिचय देते हुए पहले कक्ष में शावक के होते हुए स्वयं व अपनी पत्नी शिवानी (21) को कंबल में छुपाकर बचाया, और दैवयोग से जैसे ही गुलदार वॉशरूम के खुले दरवाजे से अंदर गया, उसने धीरे से जाकर वॉशरूम का कुंडा बाहर से बंद कर दिया। उल्लेखनीय है कि तीन सप्ताह में नगर में वन्य जीवों के आने की यह दूसरी घटना है। इससे पूर्व बीती 10 जुलाई 2015 को वयस्क भालू जू रोड स्थित प्रशांत होटल में आ घुसा था। पर्यावरणप्रेमियों के अनुसार इसे मानव के वन्य क्षेत्र में अतिक्रमण का परिणाम बताया जा रहा है।

घटना की जानकारी मिलने पर वन और पुलिस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मौके पर जुटे, लेकिन शावक को बेहोश कर पकड़ने के बाड़े इत्यादि के साथ नैनीताल चिड़ियाघर की टीम करीब सवा सात बजे मौके पर पहुंच पाई। तल्लीताल थाना प्रभारी कैलाश जोशी और वन दारोगा हीरा सिंह शाही ने पीछे गैलरी की ओर से वॉशरूम के रोशनदान से शावक को देखने की कोशिश की। इससे रोशनदान पर लगी शीशे की झिर्रियां टूट गर्इं। और शावक बाहर आने की कोशिश करने लगा। इस पर दोनों ने स्टूल को अढ़ाकर गुलदार को अंदर ही रोककर बेहोश करने का मन बनाया, किंतु तब तक वॉश बेसिन के ऊपर चढ़कर बैठा शावक दोनों पर भारी पड़ते हुए बाहर निकल आया। वन कर्मियों ने एक बार पुन: बिना बेहोश किए जाल डालकर उसे गैलरी में ही दबोचने की कोशिश की, किंतु इसी बीच वह मौका देखकर गैलरी के पीछे की ओर से बूचड़खाना, हरिनगर की ओर से जंगल में भाग गया। चिड़ियाघर के पशु चिकित्साधिकारी डा. योगेश भारद्वाज और रेंजर प्रमोद तिवारी ने उसे करीब सवा वर्ष का बताया। होटल के बाहर लगे सीसी टीवी की फुटेज के अनुसार शावक के पीछे आवारा कुत्तों का झुंड पड़ा था, और जान बचाने की कोशिश में वह खिड़की का नाजुक शीशा तोड़कर कक्ष में जा घुसा होगा।
होटल में सैलानियों की सुरक्षा सूत भर के शीशों के भरोसे
नैनीताल। नगर में तीन सप्ताह के भीतर नगर में वन्य जीवों के आने की दूसरी घटना प्रकाश में आई है, लेकिन इन दोनों घटनाओं ने नगर के होटलों में यात्रियों की सुरक्षा पर होटलों के द्वारा बरती जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। दोनों घटनाओं में वन्य जीवों ने खिड़कियों के शीशे तोड़ डाले। आज जिस होटल में घटना हुई वहां भी खिड़की के साथ ही रोशनदान में भी लोहे की रेलिंग जैसा प्रबंध नहीं था। होटल स्वामी अमित साह ने कहा कि आगे रेलिंग लगाएंगे।
पास में वैष्णो देवी मंदिर को लेकर लोगों ने आस्था से भी जोड़ा
नैनीताल। रविवार को जिस होटल में गुलदार का शावक घुसा वह हल्द्वानी रोड स्थित वैष्णो देवी मंदिर के बिलकुल करीब और सामने है। ऐसे में खासकर धार्मिक आस्था से जुड़े लोग बाघ को माता की सवारी मानते हुए आज की घटना को भी धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते देखे गए।

बाघों को बचाने की मुहिम में ‘मिशन टाइगर’

Rashtriya Sahara 31 July 2016– खूब सराहा जा रहा नैनीताल के स्थानीय कलाकारों की भूमिका वाली बाघों के संरक्षण पर अपनी तरह की पहली बॉलीवुड फिल्म को
-यहां डीएफओ रहे बीजू लाल टीआर और बॉलीवुड के ‘कव्वा बिरयानी’ फेम विजय राज हैं प्रमुख भूमिका में
-मलियाली फिल्म यूनिट ने बनाई है हिंदी फीचर फिल्म
नवीन जोशी, नैनीताल। शेड्यूल-1 यानी विलुप्त प्राय श्रेणी के बाघों को बचाने में जहां उत्तराखंड और देश जुटा है और वर्षों बाद देश में बाघों की संख्या 2500 को पार कर गई है, वहीं नैनीताल के कलाकारों से सजी बाघों के संरक्षण पर बनी पहली बॉलीवुड हिंदी फीचर फिल्म ‘मिशन टाइगर’ को दर्शकों का भरपूर समर्थन थियेटर के ‘हाउसफुल’ होने के रूप में मिल रहा है। फिल्म में नैनीताल में डीएफओ रहे बीजू लाल टीआर और बॉलीवुड के ‘कव्वा बिरयानी’ फेम विजय राज प्रमुख भूमिका में हैं। मलियाली फिल्म यूनिट द्वारा कमोबेश पूरी तरह नैनीताल एवं कालाढुंगी में फिल्माई गई इस हिंदी फीचर फिल्म में करीब आधा दर्जन बॉलीवुड कलाकारों को छोड़कर शेष सभी कलाकार नैनीताल के हैं। फिल्म बाघों के संरक्षण, उनके गैर कानूनी शिकार और कुछ साल पहले तक उनकी तेजी से घटती संख्या के मद्देनजर ‘वर्ल्ड टाइगर डे’ यानी 29 जुलाई को रिलीज की गयी है।
फिल्म की कहानी नैनीताल के पास डीएफओ विक्रम नायर (मूलत: डीएफओ टीआर बीजूलाल) द्वारा जाल बिछाते हुए बाघ की खालों, हड्डियों आदि की तस्करी से जुड़े लोगों के साथ 40 लाख रुपये में बाघ को मारने की सौदेबाजी से शुरू होती है। वह शिकारियों को रंगे हाथों पकड़ना चाहता है। उधर जंगल में इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष चल रहा है। जंगल के पास बसे एक गांव में बाघ एक महिला को मार देता है। उसकी बेटी चमेली चाहती है कि उस नरभक्षी बाघ को मार दिया जाए। चमेली का आक्रोश उसे एक दिन इलाके के चिडि़याघर तक ले जाता है, जहां वह पिंजरे में बंद बाघ को मारना चाहती है, लेकिन ऐन मौके पर विक्रम नायर के पहुंचने से बाघ बच जाता है। इधर, डील फाइनल होने के बाद कुछ दलाल रानीखेत के पास जंगलों में रहने वाले और अपनी गरीबी से परेशान एक शिकारी राम थापा (विजय राज) से संपर्क करते हैं, जो कि एक गर्भवती बाघिन से भावनात्मक जुड़ाव के बाद शिकार छोड़ चुका है। अंतत: गरीब थापा अपनी गरीबी व मजबूरी के चलते अपनी पत्नी के इलाज के लिए पांच हजार रुपये की जरूरत को पूरा करने के लिए कारण बाघ के शिकार के लिए राजी हो जाता है, किंतु आखिर उसका एवं बाघ को मारने की बात करने वाले सभी चरित्रों का हृदय परिवर्तन हो जाता है। फिल्म में बाघों के शिकारी गैंग के सरगना के रूप में भारत सरकार के गीत एवं नाटक विभाग में कलाकार रहे अनिल घिल्डियाल सहित एनएसडी स्नातक सुभाष चंद्रा, भारतेंदु नाट्य अकादमी से स्नातक मदन मेहरा, मनोज साह टोनी, जहूर आलम, धर्मवीर परमार, हरीश राणा, जितेंद्र बिष्ट, नवीन बेगाना, अनुपम उपाध्याय, मंजूर हुसैन, भुवन बिष्ट, विक्रम सयाल, चारु तिवारी, दीपक सहदेव, वन क्षेत्राधिकारी कैलाश सुयाल व बालक अंशुल सहित नगर के अनेक कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
बाघ को संस्कृति, संस्कार व दैवीय आस्था से भी जोड़ती है फिल्म
नैनीताल। फिल्म मिशन टाइगर दर्शकों को यह संदेश देने की कोशिश करती है कि बाघों का संरक्षण वास्तव प्रकृति व पर्यावरण के साथ मानव का भी संरक्षण है। फिल्म याद दिलाती है कि बाघ देवी की सवारी भी हैं। जंगल में मुसीबत में फंसने पर यदि बाघ को याद किया जाए तो वह भयमुक्त करता है। वहीं यदि मनुष्य उसे छेड़ेगा, उसके क्षेत्र में दखलअंदाजी करेगा तो बाघ भी ऐसा ही करेगा। साथ ही फिल्म सरकारों को संदेश देती है कि यदि लोगों की आर्थिकी ठीक की जाए तो उन्हें बाघों के शिकार, उन्हें अपना दुश्मन समझने से विरत किया जा सकता है। नैनीताल व कालाढुंगी एवं जिम कार्बेट पार्क के सुंदर दृश्य दिखाते हुए फिल्म इन क्षेत्रों के पर्यटन को बढ़ाने का भी काम करती है।

उत्तराखंड में वन्य जीवों की चिकित्सा भगवान भरोसे

Kunal Taxidermy-राज्य के वन विभाग में अपने पशु चिकित्सक ही नहीं हैं
-राज्य में दो चिकित्सक पशुपालन विभाग से प्रतिनियुक्ति पर और एक संविदा पर, तीनों नैनीताल जनपद में
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड में वन्य जीवों के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा पूरी तरह से भगवान भरोसे है। इस हिमालयी राज्य के लगभग 70 फीसद भू-भाग पर वन हैं। इस तरह यह देश की सर्वाधिक जैव व वन्य जीवों की विविधता वाला राज्य है, मगर आश्चर्य है कि राज्य के वन विभाग में अपने पशु चिकित्सक ही नहीं हैं। राज्यभर में वन्य जीवों की चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तीन चिकित्सकों की व्यवस्था है। इनमें से दो चिकित्सक पशुपालन विभाग से प्रतिनियुक्ति पर हैं और एक संविदा पर कार्यरत है। दिलचस्प बात यह है कि यह तीनों पशु चिकित्सक नैनीताल जनपद में हैं। इनमें से भी दो मुख्यालय में केंद्रित हैं। यानी शेष पूरे प्रदेश के वन्य जीवों की चिकित्सा का कोई प्रबंध नहीं है।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में लोगों के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्थाओं के लिए चिकित्सकों की कमी हमेशा चर्चाओं में रहती है। घरेलू पशुओं की चिकित्सा व्यवस्थाओं की स्थिति भी राज्य में बहुत बेहतर नहीं है, जबकि वन्य जीवों की चिकित्सा के लिए चिकित्सकों की व्यवस्था पर तो मानो ध्यान ही नहीं है। राज्य के वन विभाग में पशु चिकित्सकों के नाम पर मुख्यालय के भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत प्राणि उद्यान में संविदा पर डॉ. एलके सनवाल व प्रतिनियुक्ति पर डॉ. योगेश भारद्वाज कार्यरत हैं। इनके अलावा राज्य के वन विभाग में तैनात केवल एक अन्य चिकित्सक डॉ. दुष्यंत शर्मा भी जनपद स्थित जिम कार्बेट पार्क में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। इस तरह प्रदेश के वन विभाग के पास अपना एक भी पशु चिकित्सक नहीं हैं।

नैनीताल चिड़ियाघर की शान नर रॉयल बंगाल टाइगर शेरू की मौत, चिड़ियाघर प्रशासन ने 17 घंटे छिपाई मौत की खबर, पिछले वर्ष पिता बने बाघ की मृत्यु के लिए वृद्धावस्था को बताया कारण

देश के किसी चिड़ियाघर में बाघों के शावकों के जन्म की बड़ी घटना को भी छुपा गया था चिड़ियाघर प्रशासन

with Saiberian Tiger Kunal
रॉयल बंगाल टाइगर को छूने का गुमान

नवीन जोशी, नैनीताल। शेडय़ूल-1 यानी विलुप्त प्राय श्रेणी के नर रॉयल बंगाल टाइगर-शेरू की मौत रविवार (01.03.2015) शाम साढ़े पांच बजे हो गई थी, लेकिन चिड़ियाघर प्रशासन इस खबर को करीब 17 घंटे से अधिक समय तक छिपाए रहा। उसका कहना है कि वृद्धावस्था के कारण शेरू की मृत्यु हो गई। मृत शेरू की उम्र 15-16 वर्ष की बताई गई है। हालांकि डा. एलके सनवाल ने सोमवार को खुलासा किया कि पिछले वर्ष यानी जुलाई 2014 में ही इसके संसर्ग से चिड़ियाघर की मादा रॉयल बंगाल टाइगर-रानी ने एक स्वस्थ नर शिशु को जन्म दिया था। ऐसे में वृद्धावस्था से उसकी मौत सवालों के घेरे में है। डा. सनवाल के अनुसार बाघों की उम्र जंगल में रहने पर 8-9 वर्ष तथा चिड़ियाघर में रहने पर 15-16 वर्ष ही होती है। उनके अनुसार नर शिशु को जन्म देने वाली रानी ने नवजात शिशु को स्वीकार नहीं किया और अपना दूध नहीं पिलाया, जिस कारण जन्म के अगली सुबह शावक मृत पाया गया। चिड़ियाघर प्रशासन ने इस शावक के जन्म और उसके मरने की खबर भी मीडिया में नहीं आने दी, जबकि ‘राष्ट्रीय सहारा’ ने फरवरी 2014 में रानी के गर्भवती होने का समाचार प्रकाशित किया था,

वैलेंटाइन डे पर इतिहास रचने की दहलीज पर नैनीताल चिड़ियाघर

लेकिन बाद में जू प्रशासन ने रानी के स्वत: गर्भपात होने और उसके गर्भवती होने पर ही शंका जाहिर कर दी थी। उल्लेखनीय है कि 11 फरवरी 2009 को रामनगर के सर्पदुली रेंज के ढिकुली गांव की एक महिला भगवती देवी की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने और नरभक्षी घोषित किये जाने के बाद शेरू को नैनीताल चिड़ियाघर लाया गया था

अब नैनीताल में देखिए रॉयल बंगाल टाइगर

करीब सवा दो वर्ष चिड़ियाघर के वातावरण में समायोजित होने के बाद इसे 26 मई 2011 को चिड़ियाघर में आने वाले सैलानियों के दर्शनार्थ सार्वजनिक कर दिया गया था तथा नवम्बर 2011 को इसे सावल्दे रेंज में घायल अवस्था में मिली रानी के स्वस्थ होने पर सीधे संपर्क में लाकर नई संतति उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था। उनके संसर्ग से जुलाई 2014 में नर शावक का जन्म भी हुआ, जो कि वनाधिकारियों के अनुसार देश के किसी भी चिड़ियाघर में रॉयल बंगाल टाइगर के जोड़े से शावक के जन्म होने का एक रिकार्ड था, लेकिन चिड़ियाघर प्रशासन इस घटना को दबा गया। अलबत्ता, सवाल उठना लाजिमी है कि पिछले वर्ष ही नई संतति उत्पन्न करने वाले रॉयल बंगाल टाइगर की मृत्यु का कारण उसका बुजुर्ग होना कैसे हो सकता है।

पोस्टमार्टम हाउस बनता जा रहा नैनीताल चिड़ियाघर

नैनीताल। चूंकि उत्तराखंड में नैनीताल के अलावा कहीं भी पशु चिकित्सक नहीं हैं इसलिए अमूमन राज्य में कहीं भी वन्य जीवों की चिकित्सा की जरूरत पड़ने पर आसपास के पशु पालन विभाग के पशु चिकित्सक से काम चलाया जाता है। मगर उनके मरने की स्थिति में पोस्टमार्टम की जरूरत पड़ती है तो उन्हें यहीं प्राणि उद्यान में लाना पड़ता है। प्राणि उद्यान के वन क्षेत्राधिकारी मनोज साह ने बताया कि इस वर्ष 2015 में ही यहां करीब आधा दर्जन गुलदार और इससे अधिक जंगल कैट सहित डेढ़ दर्जन वन्य जीवों के पोस्टमार्टम किये जा चुके हैं। गौरतलब है कि पोस्टमार्टम के बाद वन्य जीवों की मौत की विस्तृत जांच की राज्य में व्यवस्था नहीं है। जांच के नमूनों को आईवीआरआई इज्जतनगर बरेली भेजना पड़ता है।

उत्तराखंड बनने के बाद ही मर गए 94 बाघ, वरना कुछ और होते आंकड़े

-बीते वर्ष राज्य में आठ बाघों की हुई मौत
नवीन जोशी, नैनीताल। आज प्रदेश और देश वासी उत्तराखंड में बाघों की संख्या औसतन 50 फीसद वृद्धि के साथ 340 और देश में औसतन 30 फीसद की वृद्धि के साथ 2226 हो जाने की खबर से आह्लादित हैं, लेकिन यह खुशी और बड़ी हो सकती थी। उत्तराखंड राज्य की बात करें तो यहां अलग राज्य बनने के बाद से ही अब तक 94 बाघों की मौत हो चुकी है। बीते वर्ष यानी 2014 में ही उत्तराखंड में खाद्य श्रृंखला के सबसे बड़े और शक्तिशाली माने जाने वाले आठ और देश में 66 बाघों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है, जबकि इस वर्ष 2015 में भी अब तक 7 बाघों की मौत हो चुकी है। कहना आसान नहीं कि कितने बाघों को शिकारियों ने अवैध तरीके से मारकर अकाल मौत दी होगी, लेकिन राज्य में कुल मौजूद बाघों की संख्या-340 के हिसाब से देखें तो यह मानना कठिन नहीं कि वन्य जीवों की मौतें प्राकृतिक नहीं वरन उनके जीवन में मानव के बढ़ते दखल के कारण ही अधिक हुई हैं।

वर्ष 2014 में उत्तराखंड में बाघ के मरने की पहली खबर 15 अप्रैल को तराई पश्चिमी के गेबुआ क्षेत्र से आई थी, इसके बाद तीन मई को कालागढ़ क्षेत्र में जमरिया ब्लॉक में, 30 जून को कालागढ़ में ही सोना नदी के पास, 30 जुलाई को रामनगर के कम्पार्टमेंट नंबर 40, जसपुर रेंज के फीका बीट में, चार सितंबर को जिम कार्बेट पार्क में, 28 नवंबर को कार्बेट पार्क के तराई वेस्ट डिवीजन में और 28 दिसंबर को रामनगर के देचौरी रेंज में एक-एक बाघ की मौत रिकॉर्ड हुई है। यह आंकड़े देश में बाघों की गणना व जानकारियां रखने वाली वेबसाइट-टाइगरनेट पर भी उपलब्ध हैं।

राज्य बनने के बाद कुल 1200 वन्य जीवों ने गंवाए हैं प्राण

नैनीताल। अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में पिछले 14 वर्षो में 94 बाघ, 829 गुलदार और 275 हाथियों ने अपनी जान गंवाई है। प्रदेश के वन्य जीव प्रतिपालक कार्यालय के अनुसार 275 मृत हाथियों में से 108 की मौत दुर्घटनाओं में, 15 की अवैध शिकार के लिए, एक हाथी की मौत आपसी संघर्ष में और शेष 151 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है। इस अवधि में 94 बाघों में से आठ बाघों को राज्य ने पिछले वर्ष 2014 में खोया है। अगर यहां समुचित चिकित्सा प्रबंध होते तो इनमें से कई वन्य जीवों को बचाया जा सकता था।

वन्य जीव संघर्ष में 386 लोगों ने गंवाई जान

नैनीताल। राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड राज्य में 386 लोग वन्य जीवों से हुए संघर्ष में अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें से सर्वाधिक 241 लोगों की मौत गुलदारों के द्वारा, 107 लोगों की मौत हाथियों के द्वारा, 19 की भालुओं के द्वारा, तीन की जंगली सुअरों व 16 की बाघ के द्वारा की गई है। वहीं गुलदार का शिकार हुए लोगों की वर्षवार बात करें तो 2001 में 32, 2002 में 19, 03 में 30, 04 में 117, 05 में 13, 06 में 29, 07 में 29, 08 में 13, 09 में दो, 10 में नौ, 11 व 12 में पांच-पांच, 13 में तीन तथा 14 में दो लोग गुलदार का शिकार बने।

यह भी पढ़ें : एशिया का पहला जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान और ब्याघ्र अभयारण्य

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