पहाड़ पर कहीं से आ-जा नहीं रहे, यहीं के स्थायी निवासी हैं बाघ, संख्या हुई 400 पार


-कैमरे लगाने से हुई पुष्टि, कुमाऊं में बेहद समृद्ध है वन्य जीवन, व्यापक स्तर पर इनकी गणना किये जाने की जरूरत
-कैमरा ट्रैप में तराई डिवीजन में भी मिले 30 से अधिक नये बाघ, इससे उत्साहित वनाधिकारी पहाड़ पर बाघों की संख्या की गणना किये जाने की जता रहे हैं जरूरत, स्थायी होने की वजह से डरने की जरूरत नहीं

नवीन जोशी, नैनीताल। अब तक माना जाता रहा है कि देश के राष्ट्रीय पशु बाघ (रॉयल बंगाल टाइगर) पहाड़ पर नहीं होते, यह तराई के मूल निवासी हैं, और वहां से यहां चढ़ आते हैं। वन्य जीवों तथा प्रकृति-पर्यावरण प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है कि वन विभाग द्वारा पहाड़ों पर अनेक स्थानों पर लगाए गए कैमरों ने इस मान्यता को तोड़ दिया है। कैमरों में कैद हुए बाघों ने वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध करा दिए है कि वे पहाड़ पर स्थायी रूप से रह रहे हैं। नैनीताल में वर्ष 2014 में 2511 फीट की ऊंचाई पर कैमल्स बैक चोटी पर बाघ कैमरे की पकड़ में आया था, जबकि इधर पिथौरागढ़ जिले के अस्कोट में भी करीब 12000 फीट यानी 3650 मीटर से अधिक ऊंचाई पर इसकी कैमरों से पुष्टि हो गई है। जबकि दुनिया में सर्वाधिक ऊंचाई पर बाघों को देखे जाने का रिकॉर्ड भूटान का 4100 मीटर का है। प्रदेश के वन संरक्षक डा. पराग मधुकर धकाते पहाड़ पर बाघों के स्थायी रूप से होने की पुष्टि करते हुए बताते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में वे स्वयं नैनीताल, गैरसेंण, गंगोलीहाट और चंपावत में बाघों की उपस्थिति देख चुके हैं, लिहाजा वह पहाड़ पर बाघों की सही संख्या की जानकारी के लिए औपचारिक तौर पर पूरी गणना किये जाने की जरूरत महसूस कर रहे हैं।

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कुंजाखड़क में कैमरे में कैद हुआ स्थाई रूप से रह रहा बंगाल टाइगर 

डा. धकाते ने बताया कि नैनीताल जनपद के कुंजाखड़क क्षेत्र में लगाए गए कैमरों में तीन वर्ष से बाघ स्थायी रूप से रहते नजर आए हैं। इसके अलावा टिफिन टॉप, महेश खान, बलियानाला व कृष्णापुर में भी कई नर-मादा बाघ व उनके शावक कैमरों में कैद हुए हैं। धकाते कहते हैं, हम जानते हैं बाघ का जंगल में किसी राजा की तरह अपना एक क्षेत्र होता है, यानी यहां पहाड़ों पर बाघ का स्थायी रूप से अपना क्षेत्र है। अंतराष्ट्रीय शिकारी जिम कार्बेट के जमाने से पहाड़ों पर चंपावत तक बाघ होने और अंग्रेजों द्वारा उनका शिकार किए जाने की बात पुस्तकों में मिलती है। बीच में भी ग्रामीण बाघ देखे जाने की बात कहते रहे हैं, लेकिन पहाड़ पर गुलदारों को भी बाघ कहे जाने के कारण इस संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं होती थी, लेकिन इधर वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरों में पुष्टि होने के बाद इसके वैज्ञानिक सबूत मिल गए हैं। धकाते कहते हैं, पहाड़ पर बाघों की स्थायी रूप से मौजूदगी का अर्थ यह है कि यहां की पूरी खाद्य श्रृंखला एवं जैव विविधता काफी समृद्ध है। इसके साथ ही यह भी मानना होगा कि स्थायी वाशी होने की वजह से पहाड़ों पर इनसे खास डरने की जरूरत नहीं है।
किंग कोबरा की भी है पहाड़ पर मौजूदगी
नैनीताल। बाघ की तरह ही एक अलग खाद्य श्रृंखला के सबसे ऊपरी अंग एवं मूलत: कम ऊंचाई के स्थानों का जीव बताये जाने वाले सर्पराज कहे जाने वाले किंग कोबरा को भी नैनीताल व इसके आसपास के 7500 फीट की ऊंचाई पर स्थायी रूप से देखा गया है। यहां ज्योलीकोट में जहां किंग कोबरा स्थायी रूप से रहता और संतानोत्पत्ति भी करता रिकार्ड हुआ है, वहीं 1998 में बेलुवाखान, 2004 में सेनिटोरियम व 2006 में तल्ला रामगढ़ व ज्योलीकोट में भी किंग कोबरा को देखे जाने तथा कालाढुंगी में विश्व रिकार्ड 22 फीट लंबे किंग कोबरा को देखे जाने के रिकॉर्ड दर्ज हैं। इसी तरह नैनीताल में हाथियों के आने के भी रिकार्ड हैं। 1892 में लंदन से प्रकाशित हैनरी रेमजे की पुस्तक-अपर इंडिया फॉरेस्ट में हाथियों के नैनीताल की सूखाताल झील के पास तक पहुंचने का जिक्र मिलता है, जबकि इधर बीते वर्ष नगर के निकटवर्ती देवीधूरा के बसगांव स्थित बुड़ भूमिया मंदिर के पास यानी करीब 1850 मीटर की ऊंचाइ्र तक तक हाथियों के पहुंचने की बात प्रकाश में आई थी।
नैनीताल में ठोस कूड़ा अपशिष्ट निवारण के कमजोर तंत्र की वजह से आ रहे हैं वन्य जीव
नैनीताल। नैनीताल नगर में पिछले तीन सप्ताह में दो वन्य जीवों, भालू और गुलदार के शावक के आने से नगर वासी चिंतित हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि ऐसा पिछले दिनों हुई वनाग्नि की भीषण घटनाओं के कारण हो सकता है। इससे इतर वन संरक्षक डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि नगर का कमजोर ठोस कूड़ा अपशिष्ट निवारण तंत्र इसके लिए जिम्मेदार है। लोेग नालों में कूड़े के साथ बचा खाना नालों में फेंकते हैं। नाले वन्य जीवों के हाई-वे की तरह हैं। वे इन्हीं से भोजन मिलने की उम्मीद में गुजरते हैं। पिछले दिनों की घटनाएें भी इसी कारण हुई हैं। वहीं नगर के कूड़ा खड्ड और बूचड़खाना-स्लॉटर हाउस क्षेत्र में मांश की उम्मीद में भी वन्य जीव पहुंचते हैं।

वन्य जीवों में भी ‘माँ  की ममता’

उत्तराखंड में पुख्ता हुई हिम तेंदुए की मौजूदगी भी

गढ़वाल के बाद अब कुमाऊं के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिम तेंदुए की मौजूदगी का मिला प्रमाण

नैनीताल। कुमांऊ क्षेत्र में पहली बार देश में अत्यंत दुर्लभ माने जाने वाले हिम तेंदुआ यानी स्नो लेपर्ड की तस्वीर कैमरा टैप में कैद हुई है, जिससे राज्य के वन विभाग के साथ ही वन्यजीव प्रेमियों में भी खुशी की लहर है। इससे पूर्व हिम तेंदुआ को करीब तीन दशक के बाद दो वर्ष के भीतर तीन बार,  2010 में शीतकाल में मलारी के पास, 2012 में मलारी वैली में फरकिया गांव के पास नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के अंदर धरासी मंदिर के पास और नवंबर 2012 में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के कैमरे में  कैद किया गया था।
कुमांऊ के मुख्य वन संरक्षक डा. राजेंद्र सिंह बिष्ट ने यहां बताया कि वन विभाग की टीम ने वन्य जीवों की गणना के उददेश्य से उच्च अल्पाइन और बर्फीले क्षेत्रों में कैमरा टैप लगाये थे जिसमें से एक में दुर्लभतम हिम तेंदुए की तस्वीर बीते 29 जून 2015 को कैद हो गयी। उन्होंने बताया कि कुमांऊ क्षेत्र के उंचाई वाले स्थानों में हिम तेंदुओं की मौजूदगी की बात पहले से मानी जाती रही है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब उसकी तस्वीर कैमरे में कैद हुई है। वन अधिकारी ने बताया कि जिस कैमरा टैप में हिम तेंदुआ का चित्र कैद हुआ है वह यहां से 260 किलोमीटर दूर बागेश्वर वन प्रभाग के ग्लेशियर रेंज में समुद्र तल से 4100 मीटर की उंचाई पर सुंदरढूंगा ग्लेशियर के पास दो माह पहले लगाया गया था। उन्होंने कहा कि यह तस्वीर कुमांऊ के उच्च क्षेत्रों में हिम तेंदुए की मौजूदगी का वैज्ञानिक प्रमाण हैं। डा. बिष्ट ने कहा कि हिम तेंदुए की मौजूदगी की रिपोर्ट और उसकी तस्वीर वनाधिकारियों और युवा वन्यजीव शोधकर्ताओं वाली फील्ड टीम को प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में हिम तेंदुओं की मौजूदगी से यह भी पता चलता है कि वहां उसके शिकार के लिये थार, नीलगाय और कस्तूरी मृग जैसे जानवर भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। हांलांकि, इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट अभी आनी बाकी है, लेकिन तस्वीर से पता चल रहा है कि हिम तेंदुआ स्वस्थ है, युवा है और उसका भविष्य उज्ज्वल है। डा. बिष्ट ने कहा कि दीर्घकालीन अध्ययन के तहत उसके भोजन और शिकार के लिए जानवरों की उपलब्धता का पता लगाने के लिए जल्दी ही उसकी डीएनए प्रोफाइलिंग भी की जाएगी।
अमूमन बर्फीले क्षेत्र में रहने वाला हिम तेंदुआ 3500 मीटर से ऊपरी स्थानों पर ही रहता है। बेहद शर्मीले स्वभाव का यह प्राणी रात्रि को शिकार करता है। शीतकाल में शिकार के साथ यह निचले स्थानों पर भी आ जाता है। हिम तेंदुए की खाल व अन्य अंगों की अच्छी खासी कीमत होने के चलते यह हमेशा तस्करों के निशाने पर रहा है। इनकी लगातार घट रही संख्या से वन महकमे के लिए इसका अस्तित्व बचाने की चुनौती थी। तीन फीट तीन इंच से तीन फीट आठ इंच तक ऊंचे हिम तेंदुए की पूंछ भी लंबाई के बराबर ही लंबी होती है। इसके बदन पर सफेद धब्बे होते हैं। हिम तेंदुआ भरड़, गोरल, थार, कस्तूरा मृग सहित उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले जंगली जानवरों का शिकार करता है। तीन माह में प्रजनन करने वाले हिम तेंदुए के दो से चार तक बच्चे होते हैं।

‘हनीमूनर्स टाउन’ में सफल रहा रेड पांडा के बेमेल जोड़े का ‘हनीमून’, ‘बूढ़े-नन्ही’ के घर डेढ़ वर्ष में गूंजीं दूसरी बार किलकारियां

-12.5 पिता है का वर्ष, जबकि 14-15 वर्ष होती हैं रेड पांडा की अधिकतम उम्र, जन्म देने वाली मां है केवल दो वर्ष की
नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी को पर्यटन की दुनिया में ‘हनीमूनर्स टाउन’ भी कहा जाता है। कारण, यहां आने वाले मानव सैलानियों में बड़ी संख्या नवविवाहित जोड़ों की होती है, और उनके लिए बकायदा यहां शादियों के बाद के सीजन को ‘हनीमून सीजन’ भी कहा जाता है । इधर नगर के भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणि उद्यान यानी नैनीताल जू में दार्जिलिंग से आए रेड पांडा के एक बेमेल जोड़े का ‘हनीमून’ सफल रहा है। अधितकतम 14-15 की आयु जीने वाले नर पांडा की प्रजाति के इस जोड़े के 12.5 वर्षीय ‘बूढ़े’ नर-राहुल तथा केवल दो वर्ष की ‘नन्ही’ मादा-सोनम के घर जून 2015 में दो जुड़वा बच्चों की किलकारियां गूजीं। यह दोनों नैनीताल जू में अभी हाल ही में 25 नवंबर 2014 को दार्जिलिंग चिड़ियाघर से लाए गए थे । इसके बाद ही नन्ही रेड पांडा बूढ़े नर से गर्भवती हुई, और जून 2015 माह के आखिरी सप्ताह में सोनम ने दो बच्चों को जन्म दिया।

इन दोनों के बीच नैनीताल आकर पनपा प्यार यहीं नहीं थमा। इधर बीती 21 जुलाई 2016 को एक बार फिर इन दोनों के प्यार की निशानी फिर दो बच्चों के रूप में नैनीताल चिड़ियाघर की गोद में आ गए हैं । पूरी तरह स्वस्थ यह दोनों बच्चे, रेड पांडा के ऐसे किसी बेमेल जोड़े से किसी चिड़ियाघर व खासकर ऐसे स्थान पर, जो उसका प्राकृतिक रूप से आवास स्थल भी न हो, में नई संतति के उत्पन्न होने का देश में अपनी तरह के पहले व दूसरे मामले बताये गए हैं।

उल्लेखनीय है की हमारे पास 2015 में नैनीताल जू में रेड पांडा के जोड़े के बच्चे पैदा होने की पुख्ता जानकारी थी, लेकिन चिड़ियाघर प्रशासन ने उनके बाड़े के पास सैलानियों की भीड़ बढ़ने से उन पर फर्क पड़ने, मां द्वारा बच्चों को छोड़ देने की संभावना के मद्देनजर इस बाबत समाचार प्रकाशित करने से मना कर दिया था। इधर आठ जुलाई 2015 को बच्चों के जन्म लेने की घटना को पहली बार सार्वजनिक कर दिया गया है। चिड़ियाघर प्रशासन 12.5 वर्ष के बूढ़े नर रेड पांडा राहुल और केवल दो वर्ष की मादा-सोनम के नैनीताल आने के बाद इस बारे में कतई मुतमइन नहीं थे कि इनसे नई संतति उत्पन्न हो सकती है। इसके बावजूद यहां इस हेतु प्रयास किए गए। जिसके परिणाम स्वरूप फरवरी माह में सोनम गर्भवती हुई और 20 जून के करीब इसने अपने ‘नेस्ट हाउस’ में दो स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया। सोनम अपने बच्चों को इस बीच करीब पांच-पांच दिन के अंतराल में एक ‘नेस्ट हाउस’ से दूसरे में भी ले गई है। हमारे पास इसके भी एक्सक्लूसिव चित्र उपलब्ध हैं। चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक डा. योगेश भारद्वाज ने बताया कि माता रेड पांडा को बच्चों को जन्म देने के बाद दूध बढ़ाने के लिए कैल्शियम फास्फोरस व प्रोटीन के अतिरिक्त पोषक तत्व दिए जा रहे हैं। अभी बच्चों के लिंग का पता नहीं लगा है। अभी बच्चों की आंखें भी नहीं खुली हैं। बताया गया है कि आगे सप्ताह भर में उनकी आंखें खुलेंगी। मां बच्चों को करीब तीन माह तक संभालकर रखेगी, जिसके बाद ही यह स्वतंत्र रूप से चलना-फिरना प्रारंभ करेंगे, और सैलानी इनका दीदार कर पाएंगे।

सिक्किम का राज्य पशु है रेड पांडा

रेड पांडा सिक्किम का राज्य पशु है। देश में केवल दार्जिलिंग, गंगटोक व नैनीताल चिड़ियाघर में ही पाया जाने वाले इस बेहद खूबसूरत व शर्मीले प्राणी की पहचान सर्वप्रथम वर्ष 1821 में हुई थी। पूर्व में इसे भालू की कोई प्रजाति माना जाता था, लेकिन बाद में इसे एक अलग जाति-एल्युरस कुलजेन्स में शामिल किया गया। सामान्यतया यह प्राणी सिक्किम में करीब 7000 फीट की ऊंचाई पर रहता है, जबकि नैनीताल में पहली बार यह 6200 फीट की ऊंचाई पर रह रहा है, यहां इसने बच्चे भी पैदा किए हैं, इस प्रकार यह पशु प्रेमियों के साथ ही पशुओं पर अध्ययन करने वालों के लिए खासी दिलचस्प बात है। शुरू में चिड़ियाघर प्रशासन भी इस जोड़े के यहीं गर्भधारण करने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं था, लेकिन इस तथ्य के बाद विश्वास करना पड़ा कि रेड पांडा की मादा गर्भधारण के करीब 140 दिन में बच्चे पैदा करती है। इससे साबित होता है कि मादा यहीं गर्भवती हुई थी।

नैनीताल जू पहुंचा पाकिस्तान का राष्ट्रीय पशु-मारखोर

Markhor-आगे जल्द हिमालयी थार और स्नो लेपर्ड को लाए जाने की संभावना
नैनीताल। पाकिस्तान का राष्ट्रीय पशु-मारखोर 25 फरवरी 2015 को नैनीताल स्थित भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणि उद्यान पहुंच गया है। अगले कुछ दिनों में यहां आने वाले सैलानी भी इसके दीदार कर पाएंगे। इसके एक जोड़े को दार्जिलिंग के चिड़ियाघर से यहां लाया जा रहा है। इसके साथ नैनीताल जू में कुल २३ पशु-पक्षियों की प्रजातियां हो गई हैं।
बृहस्पतिवार को दार्जिलिंग चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक डा. उत्तम प्रधान और जू कीपर प्रदीप बुधवार देर रात्रि मारखोर के एक युवा जोड़े को लेकर यहां पहुंचे। और देर शाम यहां से केंद्रीय जू प्राधिकरण की शर्तों व आपसी समझौते के अनुरूप इसके बदले कलीज फीजेंट के एक जोड़े को लेकर वापस लौट गए। नैनीताल चिड़ियाघर के वन क्षेत्राधिकारी मनोज साह ने बताया कि आगे दार्जिलिंग चिड़ियाघर से यहां हिमालयी थार और स्नो लैपर्ड को लाये जाने की योजना है। इसके लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से स्वीकृति मिल चुकी है। इससे पूर्व हाल के दिनों में यहां ब्लू शीप और रेड पांडा के जोड़े भी लाए जा चुके हैं।

अनेक मामलों में बेहद दिलचस्प है मारखोर

-फारसी में खोर का मतलब है मारने वाला और मार का मतलब सांप
-बकरी प्रजाति का सबसे बड़ा जानवर माना है मारखोर, ठुड्डी पर दाढ़ी से होती है इसके नरों की पहचान
नैनीताल। मारखोर के बारे में कई दिलचस्प तथ्य हैं। इसके फारसी भाषा के नाम के पीछे आने वाले वर्ण खोर का हिंदी अर्थ मार यानी मारना है, और मार का अर्थ-सांप। इसका नाम मारखोर होने के पीछे दो मान्यताएं हैं। पहली मान्यता के अनुसार यह सांप को मार सकता है, इसलिए इसका नाम मारखोर पड़ा। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार इसके नर के सींग सांप की तरह मुड़े हुए होते हैं। शायद इस लिए इसे मारखोर कहते हैं। वहीं यह जानना भी जरूरी है कि यह सांप को खाता नहीं है, वरन केवल मार सकता है। यह भी दिलचस्प है कि पाकिस्तान के अलावा पश्चिमी हिमालय के अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, उजबेकिस्तान व तजाकिस्तान के साथ भारत के जम्मू-कश्मीर में मिलने वाले मारखोर को पाकिस्तान के राष्ट्रीय पशु का दर्जा हासिल है। इसके नर को पहचानने का सबसे अच्छा तरीका है इसकी ठुड्डी पर मनुष्य की तरह दाढ़ी होती है, और पैरों में भी बालों के गुच्छे होते हैं। बताया जाता है कि दुनिया में इस प्रजाति के केवल 2500 पशु ही शेष बचे हैं। इसकी एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह बकरी प्रजाति का सबसे बड़ा जानवर कहा जाता है। मादा नर से आकार में काफी छोटी होती है। सर्दियों यानी जनवरी में यह प्रजनन करते हैं, और करीब साढ़े पांच माह की गर्भावस्था के बाद सामान्यतया एक से दो तथा कभी-कभार तीन बच्चे उत्पन्न करते हैं। यह भी दिलचस्प है कि यह प्राणी रंग भी बदलता है। सर्दियों में भूरे सफेद (ग्रेइश ह्वाइट) और गर्मियों में सुनहरे सफेद (गोल्डन ह्वाइट) रंग का हो जाता है।

राज्य बनने के बाद कुल 1200 वन्य जीवों ने गंवाए हैं प्राण

नैनीताल। अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में पिछले 14 वर्षो में 94 बाघ, 829 गुलदार और 275 हाथियों ने अपनी जान गंवाई है। प्रदेश के वन्य जीव प्रतिपालक कार्यालय के अनुसार 275 मृत हाथियों में से 108 की मौत दुर्घटनाओं में, 15 की अवैध शिकार के लिए, एक हाथी की मौत आपसी संघर्ष में और शेष 151 की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है। इस अवधि में 94 बाघों में से आठ बाघों को राज्य ने पिछले वर्ष 2014 में खोया है। अगर यहां समुचित चिकित्सा प्रबंध होते तो इनमें से कई वन्य जीवों को बचाया जा सकता था।

वन्य जीव संघर्ष में 386 लोगों ने गंवाई जान

नैनीताल। राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड राज्य में 386 लोग वन्य जीवों से हुए संघर्ष में अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें से सर्वाधिक 241 लोगों की मौत गुलदारों के द्वारा, 107 लोगों की मौत हाथियों के द्वारा, 19 की भालुओं के द्वारा, तीन की जंगली सुअरों व 16 की बाघ के द्वारा की गई है। वहीं गुलदार का शिकार हुए लोगों की वर्षवार बात करें तो 2001 में 32, 2002 में 19, 03 में 30, 04 में 117, 05 में 13, 06 में 29, 07 में 29, 08 में 13, 09 में दो, 10 में नौ, 11 व 12 में पांच-पांच, 13 में तीन तथा 14 में दो लोग गुलदार का शिकार बने।

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