अधिकारियों की काहिली से उत्तराखंड के किसानों को नुकसान का मुआवजा मिलना मुश्किल



-पिथौरागढ़ को छोड़कर अधिकांश जिलों ने बिना आंकलन कराए लिख दिया फसल को हुई ‘शून्य” क्षति
-नाराज आयुक्त ने दुबारा ठीक तरह से क्षति का आंकलन करने को भेजा कड़ा पत्र
नवीन जोशी, नैनीताल। क्या शहर के आलीशान कार्यालय में बैठकर गांवों में खेती की स्थिति या उसे बारिश-ओलावृष्टि ये हो रहे नुकसान का लेसमात्र अनुमान भी लगाया जा सकता है। इसका उत्तर हर कोई नहीं में ही देगा। लेकिन कुमाऊं मंडल के अधिकारियों ने कुछ ऐसी ही काहिली दिखाई है, और मंडल के छह में से पांच जिलों के संबंधित अधिकारियों ने किसानों-काश्तकारों के नुकसान से रोने-चिल्लाने को भी अनसुना कर अपने यहां बीते दिनों में हो रही बेमौसमी अत्यधिक बारिश-ओलावृष्टि से हुए नुकसान को ‘शून्य” बताया है। इन आंकड़ों पर विश्वास करना इसलिए भी मुश्किल है, और इन आंकड़ों के गलत या मनमाना होने की पुष्टि पिथौरागढ़ जिले से प्राप्त आंकड़ों को देखकर हो जाती है, जहां फसलों को 70 फीसद तक नुकसान भी हुआ है।

ज्ञातव्य हो कि बाढ़, सूखा या बारिश, ओलावृष्टि की अनावृष्टि के जरिए दैवी आपदा के तय प्राविधानों के अनुसार 50 फीसद से कम नुकसान को ‘शून्य” मानते हुए कोई मुआवजा नहीं दिया जाता है। इस प्राविधान की आढ़ में कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत व ऊधमसिंह नगर जिलों के जिला आपदा प्रबंधन अधिकारियों ने कुमाऊं आयुक्त कार्यालय को मौसम एवं फसल क्षति की रिपोर्ट एक शब्द में सिमटाकर ‘शून्य” प्रदर्शित की है। वहीं नैनीताल जिले की रिपोर्ट में जरूर कुछ स्थलीय मेहनत की गई लगती है, जिसके अनुसार अभी हाल में आई शीतकालीन वर्षा से जिले की कोश्यां-कुटौली तहसील के ग्राम पाडली व बारगल में मटर की फसल, रामगढ़, सतबूंगा व गहना में फलों की पैदावार एवं हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में गेहूं की फसल को 10 से 15 फीसद का मामूली नुकसान ही बताया गया है। वहीं पिथौरागढ़ जिले की रिपोर्ट काफी विस्तृत है। इसमें करीब पांच दर्जन गांवों में क्षति बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार ग्राम गुरना पलचौड़ा, भल्या, मटियाल व उपरतोला में 70 फीसद, सतपोखरा, राडीखूटी, गोगना, सेलग्वानी में 66 फीसद, सेरीकांडा, निसनी, खड़कूमल्या व बेड़ा में 65 फीसद, बेरीनाग के ग्वीर व पिथौरागढ़ के जमराड़ी में 62 फीसद तथा गुरना के तोक डुबकिया, बना व क्वेराली में 60 फीसद तक नुकसान हुआ है। इसके अलावा भी टुडिल, सुगड़ी, भूनी, पंगरखोली, बोराखेत, चनकाना के तोक मंदिर के निकट, पोरतोला, दौलावलिया, बेलकोट पांडे व बेलकोट भंडारी आदि एक दर्जन गांवों में 50 फीसद से अधिक नुकसान बताया गया है। यानी इन गांवों को प्राविधानों के तहत नुकसान अनुमन्य है, लेकिन अन्य जिलों के अधिकारियों द्वारा सही तरह से क्षति का आंकलन न करने की वजह से नुकसान का मुआवजा मिलना मुश्किल ही है। उच्चाधिकारी भी मान रहे हैं कि प्रदेश की भौगोलिक तथा अन्य स्थितियों को देखते हुए नुकसान के लिए अलग तरह से प्राविधान बनने चाहिए। पहाड़ों पर वैसे भी खेती काफी कम हो गई है, इसलिए उसका नुकसान कम दिखता है, लेकिन जो किसान प्रभावित होते हैं, उनके लिए वही नुकसान जीवन-मरण के प्रश्न की तरह होता है। लिहाजा, कम मात्रा में दिखने वाले नुकसान का भी आंकलन कर नुकसान के अनुसार मुआवजा देने का प्राविधान होना चाहिए।

Commissioner Avnendra Singh Nayalदुबारा रिपोर्ट मांगी है: आयुक्त

नैनीताल। कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल ने माना है कि उन्हें भेजी गई रिपोर्ट बेहद सतही तरह से तैयार की गई लगती है। इस पर उन्होंने अन्य जिलों के अधिकारियों को गंभीरता के साथ दुबारा सर्वेक्षण कर जल्द रिपोर्ट भेजने को तथा जहां किसानों को नुकसान हुआ है, उन्हें तत्काल अनुमन्य मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं।

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9 responses to “अधिकारियों की काहिली से उत्तराखंड के किसानों को नुकसान का मुआवजा मिलना मुश्किल

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