प्रकृति को संजोऐ एक वास्तविक हिल स्टेशन, रानी पद्मावती का खेत-रानीखेत


विकास की दौड़ में पीछे छूटती प्राकृतिक सुन्दरता व नैसर्गिक शांति यदि आज भी किसी पर्वतीय नगर में उसके मूल स्वरूप में देखनी और उसमें जीना है, तो यूरोपीय शैली युक्त बंगलों-भवनों के साथ किसी यूरोपीय नगर जैसा अनुभव देने वाला उत्तराखंड का रानीखेत पहली पसंद हो सकता है। 1869 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन रॉबर्ट ट्रूप द्वारा आर्मी के लिए खोजे और बसाए गए इस बेहद रमणीक नगर का इतिहास हालांकि इससे कहीं पहले कुमाऊं के चंद राजवंश के राजा सुखदेव (कहीं सुधरदेव नाम भी अंकित है) की पत्नी रानी पद्मावती से जुड़ा है, जिनके नाम से इस स्थान की पहचान रानीखेत नाम से है।

इतिहास से बात शुरू करें तो रानी पद्मावती उस दौर के कुमाऊं के गंगोलीहाट जैसे बड़े हाट-बाजार द्वाराहाट के राजमहल में रहती थीं। कहते हैं उन्हें हिमालय बेहद पसंद था, लेकिन वह द्वाराहाट से नजर नहीं आता है, इसलिए सबसे निकटस्थ स्थान रानीखेत में कहीं आज के माल रोड स्थित रानीखेत क्लब के पास स्थित एक खेत में अक्सर अपने लाव-लश्कर के साथ आ जाती थीं। तभी से इस स्थान को रानीखेत कहा जाने लगा। आगे 1815 में अंग्रेजों के कुमाऊं आगमन के बाद कैप्टन ट्रूप 1850 के आसपास कभी यहां आए और वर्तमान लाल कुर्ती के पास अपना बंगला बनवाया, और इसे ब्रिटिश आर्मी के लिए उपयुक्त मानते हुए यहां सैन्य क्षेत्र के रूप में स्थापित कराया। बाद में यहीं कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय स्थापित हुआ।
समुद्र सतह से करीब 1790 से 1869 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रानीखेत आज भी कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय है, और कमोबेश पूरा नगर कैंट क्षेत्र के प्रबंधन में आता है। इससे रानीखेत नगर का विकास अवरुद्ध हुआ है, नगर में भवन निर्माण नहीं हो पाते हैं। होटल जैसी सुविधाएं भी सीमित हैं, और इस वजह से नगर वासियों में नाराजगी भी रहती है, बावजूद नगर के कैंट क्षेत्र में होने का ही लाभ है कि रानीखेत आज भी अपने मूल पर्वतीय नगर के स्वरूप में कमोबेश वैसे ही बचा है, जैसा वह दशकों पूर्व था। आज भी यहां प्राकृतिक सौंदर्य, जंगल बचे हुए हैं। यहां की ‘फौजी’ साफ-सफाई भी इसी कारण दिल में सुकून देती है। नगर की दूसरी सबसे बड़ी खूबसूरती और ताकत यहां से नेपाल की अन्नपूर्णा से लेकर पंचाचूली, नंदादेवी, त्रिशूल से होकर हिमांचल के बंदरपूछ तक करीब 600 मील लंबी नगाधिराज हिमालय की गगनचुंबी हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के अटूट नजारे हैं, जिन्हें देखने के लिए नगर से कहीं दूर भी नहीं जाना पड़ता है, वरन यह नगर की मुख्य माल रोड और सदर बाजार जैसी बाजारों से भी आसानी से नजर आ जाते हैं। यह चोटियां सुबह-शाम सूर्य की अलग-अलग स्थितियों के बीच अलग-अलग रंगों में अपनी खूबसूरती को नए-नए आयाम देते रहते हैं। साथ ही सुंदर घाटियां, चीड़ और देवदार के ऊंचे पेड़ों युक्त घने जंगल व लताओं युक्त रास्ते, जलधाराएं, सुंदर वास्तु कला अंग्रेजी दौर के बंगले और पर्वतीय शैली में बने प्राचीन मंदिर, ऊंची उड़ान भरते तरह-तरह के पक्षियों और शहरी कोलाहल तथा प्रदूषण से दूर ग्रामीण परिवेश के अद्भुत सौंदर्य का आकर्षण ही है, जिस कारण यह शहर फिल्म निर्माताओं का भी प्रारंभ से ही पसंदीता स्थान रहा है। यहां की खूबसूरत लोकेशन पर धरमवीर, हनीमून, हुकूमत व विवाह सहित अनेकों फिल्मों का फिल्मांकन किया गया है।
नगर की यही खूबसूरती है कि इसने प्रसिद्ध घुमक्कड़ साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन की भी पसंद रहे, जो 1950 के आसपास अपने परिवार के साथ आए, और लंबे समय यहां रहे। वहीं कभी नीदरलैंड के राजदूत रहे वान पैलेन्ट ने रानीखेत के बारे में कहा-‘जिसने रानीखेत को नहीं देखा, उसने भारत को नहीं देखा।’ वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भी यह पसंदीदा स्थान रहा, जिनके नाम पर नगर की एक सड़क को ‘नेहरू रोड’ कहा जाता है। वहीं रानीखेत के साथ संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री रहे भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के साथ ही यूपी को हरगोविंद पंत व चंद्रभान गुप्ता के बाद उत्तराखंड को हरीश रावत मुख्यमंत्री देने का रोचक संयोग भी जुड़ा है। नगर के मौजूदा भली स्थिति के पूर्व विधायक व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मदन मोहन उपाध्याय का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है।
लगभग 25 वर्ग किलोमीटर में फैला रानीखेत नजदीकी काठगोदाम रेलवे स्टेशन से 85 किमी, पंतनगर हवाई अड्डे से 119, नैनीताल से 63, अल्मोड़ा से 50, कौसानी से 85 और दिल्ली से 279 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नगर के खास दर्शनीय स्थलों में मुख्य नगर से 6 किलोमीटर की दूरी पर गोल्फ प्रेमियों की पहली पसंद-गोल्फ ग्राउंड, इसके पास ही प्राचीन व प्रसिद्ध कालिका मंदिर, खूबसूरत संगमरमर से बना चिलियानौला स्थित बाबा हैड़ाखान का मंदिर, 18 किमी दूर स्थित बिन्सर महादेव मंदिर, घंटियों के लिए प्रसिद्ध झूला देवी मंदिर, कुमाऊँ रेजिमेंट का संग्रहालय, प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री राम जी लाल द्वारा स्थापित वनस्पति संग्रहायल (हरबेरियम ), डिलीसियस प्रजाति के स्वादिष्ट सेबों के लिए प्रसिद्ध चौबटिया स्थित फलों के उद्यान और फल अनुसंधान केंद्र, करीब 38 किलोमीटर दूर कुमाऊं के कत्यूरी राजवंश के दौर की बेजोड़ कला युक्त विशाल मंदिर समूह, रामायण में संजीवनी बूटी से संबंधित बताए जाने वाले दूनागिरि मंदिर, महाभारतकालीन पांडुखोली, शीतलाखेत, देश का कोणार्क के बाद दूसरा सूर्य मंदिर कटारमल तथा मछली पकड़ने के लिए प्रसिद्ध 1903 में ब्रितानी सरकार द्वारा निर्मित भालू बांध आदि नजदीकी दर्शनीय स्थल हैं।
रानीखेत में गर्मी के दिनों में मौसम सामान्य, जुलाई से लेकर सितम्बर तक का मौसम बरसात का और फिर नवंबर से फरवरी तक बर्फबारी और ठंड वाला होता है, लेकिन हर मौसम में यहां घूमने का अपना अलग आनंद देता है। मैदानी गर्मी से राहत पाने के लिए मार्च से जून तक का किंतु प्राकृतिक सौंदर्य का वास्तविक आनंद प्राप्त करने के लिए सितम्बर से नवंबर के बीच का समय सबसे बेहतर माना जाता है।

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