अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकेगा भारत!


-अमेरिका की अगुआई में चल रहा है अध्ययन, अरब सागर और भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों में समानता मिलने की है संभावना

-परियोजना में भारत के आठ वैज्ञानिक शामिल, जिनमें कुमाऊं विवि के भूविज्ञानी एवं वाडिया संस्थान के शोध छात्र भी

-सामरिक दृष्टिकोण से भारत के लिए हो सकता है अत्यधिक महत्वपूर्ण

प्रो.जी.के.शर्मा
प्रो.जी.के.शर्मा

नवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिका की एक परियोजना के तहत हो रहे भू-वैज्ञानिक महत्व के शोध भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इस परियोजना के तहत प्रारंभिक आकलनों के अनुसार अरब सागर भारतीय प्रायद्वीप की चट्टानों से ही बना हो सकता है। यदि यह आकलन अपने निष्कर्षो पर इसी रूप में पहुंचे तो भारत अरब सागर पर अपना दावा ठोक सकता है और इस पर अमेरिका का भी स्पष्ट तौर पर जुड़ाव होने की वजह से विश्व बिरादरी की मुहर भी आसानी से लग सकती है। कुल मिलाकर यह परियोजना भारत को बड़ा सामरिक लाभ दिला सकती है।अरब सागर भारत के दक्षिण पश्चिम में करीब 38.62 लाख वर्ग किमी में फैला है और करीब 2400 किमी यानी करीब 1500 नॉटिकल मील (सामुिद्रक दूरी मापने की इकाई) की चौड़ाई में स्थित है। हिमालय से निकलकर भारत से होते हुए पाकिस्तान से इसमें आने वाली प्रमुख नदी सिंधु के नाम पर इसका प्राचीन भारतीय नाम ‘सिंधु सागर’ था, लेकिन बाद में अंग्रेजी दौर में इसका नाम अरब सागर, उर्दू व फारसी में बह्न-अल-अरब और यूनानी भूगोलवेत्ताओं के द्वारा इरीरियन सागर भी कहा जाता है। बहरहाल अमेरिका की एक परियोजना-‘ज्वॉइंट इंटीग्रेटेड ओसेन ड्रिलिंग प्रोग्रोम’ के तहत अरब सागर की भूसतह की चट्टानों का भारतीय सतह से मिलान किया जा रहा है। इस परियोजना में अमेरिका सहित जर्मनी, जापान व भारत के करीब 36 अलग-अलग क्षेत्रों में महारत रखने वाले भूवैज्ञानिक शामिल हैं। भारत की इस परियोजना में 50 फीसद की वित्तीय भागेदारी के साथ अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। इसमें उत्तराखंड से कुमाऊं विवि के भू-विज्ञान विभाग के प्रोफेसर जीके शर्मा तथा वाडिया इंस्टीटय़ूट देहरादून के एक शोध छात्र अनिल कुमार सहित भारत के सर्वाधिक आठ वैज्ञानिक शामिल हैं। प्रोजेक्ट में भारत के एक वैज्ञानिक को सह टीम लीडर की हैसियत भी प्राप्त है। परियोजना में शामिल प्रो. शर्मा बताते हैं इस परियोजना के तहत भूवैज्ञानिकों की टीम पूरे दो माह अरब सागर में रहकर लौटी है। परियोजना के तहत उनके जिम्मे अरब सागर की सतह पर पाई जाने वाली ‘रेडियो लेरिया’ नाम की ‘माइक्रो फॉसिल’ यानी एक तरह का जीवाश्म है, जिसके जरिये वह इस जीवाश्म का भारत के तमिलनाडु में पाई जाने वाली देश की करीब 12 अरब वर्ष पुरानी चट्टानों से संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा अन्य वैज्ञानिक करीब 15-20 प्रकार की अरब सागर की भू-सतह की मूल ‘इग्नियस’ यानी आग्नेय और ‘मेटा मॉर्फिक’ यानी कायांतरित चट्टानों तथा उन पर ताजा मिट्टी के जमाव का अलग-अलग दृष्टिकोणों से अध्ययन करेंगे। अपने अध्ययनों से वह प्रारंभिक तौर पर कह सकते हैं कि भारत के तमिलनाडु और अरब सागर की गहराइयों में मौजूद चट्टानों में समानता हो सकती है।

पेट्रोलियम भंडार का भी खुल सकता है राज

नैनीताल। प्रो. जीके शर्मा के अनुसार उनके द्वारा किए जा रहे ‘रेडियो लेरिया’ नाम की ‘माइक्रो फॉसिल’ के अध्ययन में भारत और तमिलनाडु की चट्टानों की एकरूपता के साथ ही इस जीवाश्म से ही पेट्रोलियम पदार्थो व गैस इत्यादि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हो सकती है कि यह पदार्थ अरब सागर में कितनी गहराई में और कहां हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रो. शर्मा पूर्व में अंटार्कटिक महासागर और भारती चट्टानों की एकरूपता की जांच भी कर चुके हैं, तथा उन्हें दुनिया के सभी समुद्रों में जाकर शोध अध्ययन करने का गौरव भी प्राप्त है।

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