मां ‘नयना की नगरी’ में होती है राज राजेश्वरी मां नंदा की ‘लोक जात’


Flowering on Nanda-Sunada
Flowering on Nanda-Sunada

-यहां राज परिवार का नहीं होता आयोजन में दखल, जनता ने ही की शुरुआत, जनता ही बढ़-चढ़ कर करती है प्रतिभाग
नवीन जोशी, नैनीताल। प्रदेश में चल रही मां नंदा की ‘राज जात’ से इतर मां नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा की ‘लोक जात’ का आयोजन किया जाता है। अमूमन 12 वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाली ‘राज जात’ के इतर सरोवरनगरी में 111 वर्षों से हर वर्ष अनवरत, बीच में प्रथम व द्वितीय दो विश्व युद्धों की विभीषिका के बावजूद बिना किसी व्यवधान के न केवल यह महोत्सव जारी है, वरन हर वर्ष समृद्ध भी होता जा रहा है। बिना राज परिवार के जनता द्वारा शुरू किए गए और जनता की ही सक्रिय भागेदारी से आयोजित होने वाले इस महोत्सव को मां नंदा की ‘लोक जात’ ही अधिक कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि नैनीताल में कुमाऊं-गढ़वाल को एक सूत्र में पिरोने वाली मां नंदा के महोत्सव की सरोवरनगरी में शुरुआत राज परिवार के बजाय नगर के संस्थापकों में शुमार मोती राम शाह ने 1903 में अल्मोड़ा से लाकर की थी। तभी से नगर वासियों की इस महोत्सव और माता नंदा-सुनंदा के प्रति ऐसी अटूट आस्था है कि वह और खासकर महिलाएं वर्ष भर इस महोत्सव का इंतजार करते हैं। अब भी देश ही नहीं विदेशों में रहने वाले नगर के प्रवासी भी वर्ष में कम से कम इस मौके पर अवश्य घर लौटते हैं।
वर्तमान नंदा महोत्सवों के आयोजन के बारे में कहा जाता है कि पहले यह आयोजन चंद वंशीय राजाओं की अल्मोड़ा शाखा द्वारा होता था, किंतु 1938 में इस वंश के अंतिम राजा आनंद चंद के कोई पुत्र न होने के कारण तब से यह आयोजन इस वंश की काशीपुर शाखा द्वारा आयोजित किया जाता है, जिसका वर्तमान में प्रतिनिधित्व नैनीताल के पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा करते हैं। नैनीताल की स्थापना के बाद वर्तमान बोट हाउस क्लब के पास नयना देवी के मूल मंदिर की स्थापना की गई थी, 1880 में यह मंदिर नगर के विनाशकारी भूस्खलन की चपेट में आकर दब गया, जिसे बाद में वर्तमान नयना देवी मंदिर के रूप में स्थापित किया गया। यहां मूर्ति को स्थापित करने वाले मोती राम शाह ने ही 1903 में अल्मोड़ा से लाकर नैनीताल में नंदा महोत्सव की शुरुआत की। इस प्रकार शुरुआत में यह आयोजन नयना देवी मंदिर समिति द्वारा आयोजित होता था। आगे मोती राम शाह के पुत्र अमर नाथ साह व पौत्र उदय नाथ साह ने भी यह आयोजन कराया, और आखिर उदय नाथ साह ने 1926 से यह आयोजन नगर की सबसे पुरानी 1918 में स्थापित धार्मिक सामाजिक संस्था श्रीराम सेवक सभा को दे दिया, जो तभी से लगातार दो विश्व युद्धों के दौरान भी बिना रुके 112 वर्षों सेसफलता से और नए आयाम स्थापित करते हुए यह आयोजन कर रही है। यहीं से प्रेरणा लेकर अब कुमाऊं के कई अन्य स्थानों पर भी नंदा महोत्सव के आयोजन होने लगे हैं। इधर इस वर्ष 2015 से  महोत्सव के तहत फ्लैट्स मैदान में होने वाली मेले की जिम्मेदारी नैनीताल नगर पालिका को दे दी गयी है। यहां के बाद ही प्रदेश के अनेक स्थानों पर नंदा देवी महोत्सवों की शुरुआत हुई है, लिहाजा नैनीताल को नंदा महोत्सवों का प्रणेता भी कहा जाता है।

उत्तराखंड की ‘कुलदेवी’ हैं, ‘आराध्य देवी’ हैं अथवा ‘विजय देवी’ हैं राज राजेश्वरी मां नंदा ?

एक शताब्दी से पुराना और अपने 112वें वर्ष में प्रवेश कर रहा सरोवरनगरी का नंदा महोत्सव आज अपने चरम पर है। पिछली शताब्दी और इधर तेजी से आ रहे सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी यह महोत्सव न केवल अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहा है, वरन इसने सर्वधर्म संभाव की मिशाल भी पेश की है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी यह देता है, और उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं व गढ़वाल अंचलों को भी एकाकार करता है। यहीं से प्रेरणा लेकर कुमाऊं के विभिन्न अंचलों में फैले मां नंदा के इस महापर्व ने देश के साथ विदेश में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली है।
इस मौके पर मां नंदा सुनंदा के बारे में फैले भ्रम और किंवदंतियों को जान लेना आवश्यक है। विद्वानों के इस बारे में अलग अलग मत हैं, लेकिन इतना तय है कि नंदादेवी, नंदगिरि व नंदाकोट की धरती देवभूमि को एक सूत्र में पिरोने वाली शक्तिस्वरूपा मां नंदा ही हैं। यहां सवाल उठता है कि नंदा महोत्सव के दौरान कदली वृक्ष से बनने वाली एक प्रतिमा तो मां नंदा की है, लेकिन दूसरी प्रतिमा किन की है। सुनंदा, सुनयना अथवा गौरा पार्वती की ?

एक दंतकथा के अनुसार मां नंदा को त्रेता युग में नंद यशोदा की पुत्री महामाया भी बताया जाता है जिसे दुष्ट कंश ने शिला पर पटक दिया था, लेकिन वह अष्टभुजाकार रूप में प्रकट हुई थीं। यही नंद पुत्री महामाया नवदुर्गा कलियुग में चंद वंशीय राजा के घर नंदा रूप में प्रकट हुईं, और उनके जन्म के कुछ समय बाद ही सुनंदा प्रकट हुईं। राज्यद्रोही शडयंत्रकारियों ने उन्हें कुटिल नीति अपनाकर भैंसे से कुचलवा दिया था। उन्होंने कदली वृक्ष की ओट में छिपने का प्रयास किया था लेकिन इस बीच एक बकरे ने केले के पत्ते खाकर उन्हें भैंसे के सामने कर दिया था। बाद में यही कन्याएं पुर्नजन्म लेते हुए नंदा-सुनंदा के रूप में अवतरित हुईं और राज्यद्रोहियों के विनाश का कारण बनीं। इसीलिए कहा जाता है कि नंदा-सुनंदा अब भी चंदवंशीय राजपरिवार के किसी सदस्य के शरीर में प्रकट होती हैं, और वह चंद वंशीय राजाओं की ‘कुल देवियाँ’ हैं । इस प्रकार दो प्रतिमाओं में एक नंदा और दूसरी सुनंदा हैं।

लेकिन कुछ अन्य विद्वान नंदा को राज्य की कुलदेवी की बजाय शक्तिस्वरूपा मां के रूप में मानते हैं। उनका कहना है कि चंदवंशीय राजाओं की पहली राजधानी में मां नंदा का कोई मंदिर न होना सिद्ध करता है कि नंदा उनकी कुलदेवी नहीं, वरन विजय देवी व आध्यात्मिक दृष्टि से आराध्य देवी थीं। वह चंदवंशीय राजाओं की कुलदेवी मां ‘गौरा-पार्वती’ को मानते हैं। कहते हैं कि जिस प्रकार गढ़वाल नरेशों की राजगद्दी भगवान बदरीनाथ को समर्पित थी, उसी प्रकार कुमाऊं नरेश चंदों की राजगद्दी भगवान शिव को समर्पित थी, इसलिए चंदवंशीय नरेशों को ‘गिरिराज चक्र चूढ़ामणि” की उपाधि भी दी गई थी। इस प्रकार गौरा उनकी कुलदेवी थीं, और उन्होंने अपने मंदिरों में बाद में जीतकर लाई गई नंदा और गौरा को राजमंदिर में साथ-साथ स्थापित किया। इस प्रकार दो मूर्तियों में से एक मूर्ति हिमालय क्षेत्र की आराध्य देवी पर्वत पुत्री नंदा और दूसरी ‘गौरा-पार्वती’ की हैं। इसीलिए प्रतिमाओं को पर्वताकार बनाने का प्रचलन है।

वहीँ एक अन्य किंवदंती के अनुसार नंदा का जन्म गढ़वाल की सीमा पर अल्मोड़ा जनपद के ऊंचे नंदगिरि पर्वत पर हुआ था। गढ़वाल के राजा उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में ले आऐ थे, और अपने गढ़ में स्थापित कर लिया था। इधर कुमाऊं में उन दिनों चंदवंशीय राजाओं का राज्य था। 1563 में चंद वंश की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की। इस दौरान 1673 में चंद राजा कुमाऊं नरेश बाज बहादुर चंद (1638 से 1678) ने गढ़वाल के जूनागढ़ किले पर विजय प्राप्त की और वह विजयस्वरूप मां नंदा की मूर्ति को डोले के साथ कुमाऊं ले आए। कहा जाता है कि इस बीच रास्ते में राजा ने गरुड़ बागेश्वर मार्ग के पास स्थित डंगोली गांव में रात्रि विश्राम के लिए रुके। दूसरी सुबह जब विजयी राजा का काफिला अल्मोड़ा के लिए चलने लगा तो मां नंदा की मूर्ति आश्चर्यजनक रूप से दो भागों में विभक्त मिली। इस पर राजा ने मूर्ति के एक हिस्से को वहीं ‘कोट भ्रामरी” नामक स्थान पर स्थापित करवा दिया, जो अब ‘कोट की माई” के नाम से जानी जाती हैं। अल्मोड़ा लाई गई दूसरी मूर्ति को अल्मोड़ा के मल्ला महल स्थित देवालय (वर्तमान जिलाधिकारी कार्यालय) के बांऐ प्रकोष्ठ में स्थापित कर दिया गया। इस प्रकार विद्वानों के अनुसार मां नंदा चंद वंशीय राजाओं के साथ संपूर्ण उत्तराखंड की ‘विजय देवी’ हैं।

मजबूत कलापक्ष है पूरी तरह से ‘ईको फ्रेंडली’ और नंदा-सुनंदा की सुंदर मूर्तियों का राज

नंदा-सुनंदा
नंदा-सुनंदा

-कभी चांदी से बनाई जाती थीं मूर्तियां, 50 के दशक में मूर्तियों के चेहरे की मुस्कुराहट आज भी की जाती है याद
-1903 से लगातार बीच में दो विश्व युद्धों के दौरान भी जारी रहते हुऐ 112 वर्षों से यहां जारी है महोत्सव
नवीन जोशी, नैनीताल। नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां पूरे प्रदेश में सबसे सुंदर तरीके से बनती हैं। इसका कारण यहां मूर्ति निर्माण में कलापक्ष पर अधिक ध्यान दिया जाना है। साथ ही यहां आयोजक संस्था हमेशा बेहतरी के लिये बदलावों को स्वीकार करने को तैयार रहती है। इसी कारण बीते कुछ वर्षों से नंदा-सुनंदा की मूर्तियां पूरी तरह ‘ईको-फ्रेडली’ यानी पर्यावरण-मित्र पदार्थों से तैयार की जाती हैं। जबकि यहां एक दौर में चांदी की मूर्तियां बनाए जाने का इतिहास भी रहा है।
उल्लेखनीय है कि नैनीताल को अल्मोड़ा के साथ ही प्रदेश के अनेक स्थानों पर आयोजित होने वाले नंदादेवी महोत्सवों का प्रणेता कहा जाता है। यहां 1903 से लगातार बीच में दो विश्व युद्धों के दौरान भी जारी रहते हुऐ 112 वर्षों से महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इधर राज्य के अनेक नगरों में यह आयोजन होने लगे हैं, बावजूद नैनीताल की मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां अल्मोड़ा सहित अन्य सभी नगरों से सुंदर होती हैं। 1950 से मूर्ति निर्माण से जुड़े आयोजक संस्था श्रीराम सेवक सभा के संरक्षक गंगा प्रसाद साह बताते हैं कि पूर्व में यहां भी परंपरागत मूर्तियां ही बनती थीं। 1945 के दौरान से यहां बदलाव आने लगे, 50 में शारदा संघ के संस्थापक कलाप्रेमी बाबू चंद्र लाल साह व कला मंदिर फोटोशॉप के स्वामी मूलचंद की जुगलबंदी के बाद यहां मूर्तियां सुंदर बनाई जाने लगीं। 1955-56 तक नंदा देवी की मूर्तियों  का निर्माण चांदी से होता था। लेकिन बाद में वापस परंपरागत परंतु अधिक सुंदर मूर्तियां बनने लगीं। ठाकुर नवाब साह, रमेश चन्द्र चौधरी आदि ने भी मूर्ति निर्माण में योगदान दिया। वरिष्ठ कलाकार चंद्र लाल साह 1971 तक मूर्तियों का निर्माण करते रहे, और इस दौरान माता के चेहरे पर दिखने वाली मुस्कुराहट को लोग अब भी याद करते हैं। बाद में प्रसिद्ध चित्रकार विश्वम्भर नाथ साह ‘शखा दाज्यू’ जैसे स्थानीय कलाकारों ने मूर्तियों को सजीव रूप देकर व लगातार सुधार किया, जिसके परिणाम स्वरूप नैनीताल की नंदा-सुनंदा की मूर्तियां, महाराष्ट्र के गणपति बप्पा जैसी ही जीवंत व सुंदर बनती हैं। खास बात यह भी कि मूर्तियों के निर्माण में पूरी तरह कदली वृक्ष के तने, पाती, कपड़ा, रुई व प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग किया जाता है। बीते करीब एक दशक से थर्माेकोल का सीमित प्रयोग भी बंद कर दिया गया है, जिसके बाद महोत्सव पूरी तरह ‘ईको फ्रेंडली” भी हो गया है। श्री साह बताते हैं-हर वर्ष मूर्तियां समान आकार की बनें इस हेतु भी खास ध्यान रखा जाता है। गत वर्षों की मूर्ति के कपड़े को देखकर भी मूर्ति बनाई जाती है। इधर बेहतर स्वरूप के लिये मां के चेहरे में कपड़े के भीतर परिवर्तन किया गया है। साथ ही मां के चेहरे को मुस्कुराहट लिए हुए बनाने की कोशिश की गई है, इससे मां की सुंदरता देखते ही बन रही है। आगे उन्होंने अगले वर्ष से परिस्थितियों के अनुरूप इस दिशा में ‘और कुछ नया’ करने का इरादा भी जताया।

हर वर्ष नयी पहलों से लगातार समृद्ध होता रहा है नंदा महोत्सव

नवीन जोशी, नैनीताल। कहते हैं कि प्रगति तभी सही मायनों में प्रगति होती है, जब वह सतत भी हो। कुछ इसी कसौटी पर सरोवरनगरी का ऐतिहासिक नंदा महोत्सव सांस्कृतिक विरासतों को सहेजने के साथ ही साल दर साल नए पायदानों को आत्मसात करता हुआ लगातार समृद्ध होता चला जा रहा है। कुमाऊं -गढ़वाल को एक सूत्र में पिरोने वाली मां नंदा के इस महोत्सव में हर वर्ष कुछ न कुछ नया अवश्य होता है। मेला स्थल में सीसीटीवी कैमरों से सुरक्षा प्रबंधों के साथ ही महोत्सव का सीधा प्रसारण कुमाऊं अंचल के सुदूरवर्ती रानीखेत-द्वाराहाट व गैरसैंण तक भी केबल के माध्यम से किया जा रहा है। महोत्सव को नैनी झील को धार्मिक सरोकारों से जोड़ते हुए झील की पंचआरती करने के साथ ही नगर वासियों से अपने घरों से भी सरोवर की आरती करने जैसी अपीलें भी आयोजक संस्था द्वारा की जाती हैं।
महोत्सव में हर वर्ष कुछ नया और महोत्सव के स्वरूप को बेहतर बनाने का प्रयास भी रहता है। मूर्तियों के निर्माण के लिए दो कदली वृक्ष काटकर प्रयोग किये जाते हैं तो इनके बदले 21 फलदार वृक्ष रोपने की परंपरा वर्ष 1998 से पर्यावरण मित्र यशपाल रावत के सुझाव पर चल रही है। वर्ष 2005 से मेले में फोल्डर स्वरूप से स्मारिका छपने लगी, जिसका आकार वर्ष 2014 में 400 पृष्ठों तक फैल गया था। वर्ष 2007 से तल्लीताल दर्शन घर पार्क से मां नंदा के साथ नैनी सरोवर की आरती की एक नई परंपरा भी जोड़ी गई है, जो प्रकृति से मेले के जुड़ाव का एक और आयाम है। वर्ष 2011 से मेले की अपनी वेबसाइट बनाकर देश दुनिया तक सीधी पहुंच भी बनाने का प्रयास हुआ,जो हालांकि आगे बंद हो गई। वर्ष 2012 में पशु बलि की परंपरा को हतोत्साहित करते हुए इसकी जगह नारियल चढ़ाने को बढ़ावा दिया जाने लगा। इधर 2014 में आयोजक संस्था की अपनी वेबसाइट के जरिए महोत्सव का प्रचार-प्रसार करने की कोशिष की जा रही है। साथ ही केवल मेले के लिए ही नहीं नगर के मल्लीताल क्षेत्र में करीब 2.25 लाख रुपए की लागत से 16 सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए, और सुरक्षा के मद्देनजर मेले के दुकानदारों के पहचान पत्र लेकर उनका पुलिस से सत्यापन भी कराया गया, जो आयोजक संस्था के सामाजिक सरोकारों से और अधिक गहराई से जुड़ने का भी बड़ा उदाहरण है। वहीं ‘एचसीएस’ चैनल के जरिए नगर के साथ ही भवाली, भीमताल, काठगोदाम, हल्द्वानी, सितारगंज, लालकुआ, रामनगर, कालाढुंगी, बाजपुर, रानीखेत, द्वाराहाट व गैरसैंण तक मेले का सजीव प्रसारण दिखाने का प्रबंध किया गया। मेले के दौरान दूरदराज से आने वाले ग्रामीणों के लिए मंदिर परिसर के साथ ही राम सेवक सभा प्रांगण में भी हर रोज नि:शुल्क भंडारे की व्यवस्था भी की जाने लगी। इसके साथ ही मेले में 40 स्टॉलों में सरकारी विभागों की विकास प्रदर्शनी व 20 स्टॉलों में स्वयं सेवी संस्थाओं के उत्पादों का प्रदर्शन भी करने का प्रबंध किया गया। फेशबुक, गूगल प्लस व ट्विटर सरीखी सोशल साइटों के जरिये भी मेला स्थानीय लोक कला के विविध आयामों, लोक गीतों, नृत्यों, संगीत की समृद्ध परंपरा का संवाहक बनने के साथ संरक्षण व विकास में भी योगदान दे रहा है। इधर इस वर्ष 2015 से  महोत्सव के तहत फ्लैट्स मैदान में होने वाली मेले की जिम्मेदारी नैनीताल नगर पालिका को दे दी गयी है।  यहीं से प्रेरणा लेकर कुमाऊं के विभिन्न अंचलों में फैले मां नंदा के इस महापर्व ने देश के साथ विदेशों में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली है। शायद इसी लिए यहां का महोत्सव जहां प्रदेश के अन्य नगरों के लिए प्रेरणादायी साबित हुआ है।

यह भी पढ़ें-कौन हैं दो देवियां, मां नंदा-सुनंदा

पिछले आठ वर्षों से बन रहीं माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां देखिएः 

नंदा-सुनंदा से जुड़े कुछ और संबंधित चित्रः 

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