हरीश रावत : यह हश्र तय ही था शायद !


आखिर फ़रवरी 2014 में अपने ही एक कार्यकर्ता को झन्नाटेदार झापड़ मारने से त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की बीती 18 मार्च 2016 को विधान सभा में मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के बीच हुई मारपीट से पतन की कहानी शुरू हुई, और आखिर 27 मार्च को उनकी दो वर्ष एक माह लम्बी पारी का समापन हो गया। उनके इस हश्र की आशंका पहले ही जता दी गयी थी।

  • राष्ट्रपति शासन 27 फ़रवरी को : 7 + 2 = 9
  • विधायक बागी हुए = 9
  • वर्ष 2016 = 2 + 0 +1 + 6 = 9
  • राज्य को अब मिलेगा नौवां मुख्यमंत्री
  • तो क्या 9 का अंक हुआ रावत के लिए अशुभ, क्या घोड़े (Horse) से शुरू हुई उत्तराखंड की राजनीति में Horse Trading के आरोपों के बाद रावत को पड़ी ‘नौ’लत्ती

त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की धनै के पीडीएफ से इस्तीफे, महाराज के आशीर्वाद बिना और झन्नाटेदार थप्पड़ जैसे एक्शन-ड्रामा के साथ हुई ताजपोशी के बाद यही सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या रावत अपना बोया काटने से बच पाएंगे। इस बाबत आशंकाएं गैरवाजिब भी नहीं हैं। रावत के तीन से चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में उपलब्धियों के नाम पर वादों और विरोध के अलावा कुछ नहीं दिखता।

हरीश रावत का उत्तराखंड की राजनीति में उदय किसी ‘धूमकेतु’ की तरह हुआ था। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही जनता के दुलारे इस राजनेता का ऐसा आकर्षण था, कि उन्होंने सबसे कम उम्र में ब्लाक प्रमुख बनने का रिकार्ड बनाया। हालांकि बाद में निर्धारित से कम उम्र का होने के कारण उन्हें भिकियासेंण के ब्लाक प्रमुख के पद से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों पर पद से हटना पड़ा था। और आज भी राज्य की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद उन्हें पद से हटना पड़ा है, और आज की तिथि में बकौल स्वयं उनके वह ‘सिर कटे’ मुख्यमंत्री हैं। यह दुर्योग ही कहा जायेगा कि एक अन्य ‘सिर कटे’ राहु ने भी अपने दौर में आज के दौर के सत्ता शीर्ष की तरह का ‘अमरत्व’ प्राप्त भी कर लिया था, किंतु आखिर उसे सिर काट कर वापस उसकी अपनी लाइन में भेज दिया गया।
हालांकि रावत गिरते-टूटते भी फिर सिर उठाकर खड़े होने की राजनीतिक कला बखूबी जानते हैं कि आज की तिथि में यह सवाल मौजू है कि उनकी राजनीति का जो हश्र हुआ है, क्या वह अनपेक्षित था कि यह तय ही था। रावत पर दूसरा पहलू अधिक उभर कर आता है। कहते हैं मनुश्य जैसा बोता है, वही उसे काटना पड़ता है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय। रावत पर यह उक्ति कहीं अधिक सटीक बैठती है। रावत ने जैसा-जैसा किया, वैसा-वैसा उनके साथ भी होता चला गया।
रावत ने भाजपा की बीते दौर की त्रिमूर्तियों में शुमार मुरली मनोहर जोशी को अल्मोड़ा में हराकर राजनीतिक रूप से तड़ीपार कराया तो यही दंश उन्हें भी अल्मोड़ा से हरिद्वार ‘भागने’ को मजबूर होने के रूप में झेलना पड़ा। पार्टी में उनके अग्रज पं. नारायण दत्त तिवारी की राजनीतिक यात्रा का अंत एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से हुआ था। आरोप लगता है कि इसके पीछे रावत थे। अब रावत की आज तक की राजनीतिक यात्रा, कम से कम राजनीतिक शीर्ष पर पहुंचने की यात्रा का अंत करने में भी एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ ने सर्वप्रमुख भूमिका निभाई है। 2012 में बकौल उनके सिपहसालार तत्कालीन सांसद प्रदीप टम्टा, सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के लिए विजय बहुगुणा ने रावत के ‘पीठ मंे छुरा’ भौंका था, तो 2014 में रावत भी बहुगुणा की ‘छाती में वार’ जैसा ही कुछ करके ही सत्ता में आए थे। तो अब बहुगुणा ने फिर उन्हें पटखनी मिली है, तो इसे उसी वार-प्रतिवार की श्रृंखला का ही एक हिस्सा माना जाएगा। वहीं उन्हांेने फरवरी 2014 में उत्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने की शुरुआत अपने ही एक कार्यकर्ता को झन्नाटेदार थप्पड़़ जड़ने से की थी, तो सदन में उनके आखिरी दिन भी ऐसे ही एक और ‘थप्पड़ की गूंज’ भी बाहर तक सुनाई दी थी। ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके साथ यह बड़ा सवाल रावत की ताजपोशी के दिन से उठ रहा है कि क्या रावत अपना बोया काटने से बच पाएंगे।
रावत के तीन से चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में उपलब्धियों पर नजर डालें तो वहां राजनीतिक चाल-चतुराई, शब्दों को घुमा-घुमाकर मीठी छुरी से विरोधियों ही नहीं सहयोगियों पर भी वार-प्रतिवार, वादों और विरोध के अलावा कुछ नहीं दिखता। चाहे राज्य की पिछली बहुगुणा सरकार हो या 2002 में प्रदेश में बनी पं. नारायण दत्त तिवारी की सरकार, रावत ने कभी अपनी सरकारों और मुख्यमंत्रियों के विरोध के लिए विपक्ष को मौका ही नहीं दिया। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते चाहे श्रम राज्य मंत्री का कार्यकाल हो, उन्होंने बेरोजगारी व पलायन से पीड़ित अपने राज्य के लिए एक भी कार्य उपलब्धि बताने लायक नहीं किया। वह कृषि मंत्री बने तब भी उन्होंने लगातार किसानी छोड़कर पलायन करने को मजबूर अपने राज्य के किसानों के लिए कुछ नहीं किया। जल संसाधन मंत्री बने, तब भी अपने राज्य की जवानी की तरह ही बह रहे पानी को रोकने या उसके सदुपयोग के लिए एक भी उल्लेखनीय पहल नहीं की। कुल मिलाकर तीन-चार दशक लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद रावत के पास अपनी उपलब्धियां बताते के लिए कुछ है तो अपने उत्पाती प्रकृति के समर्थकों की धरोहर है, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि वे आखिरी समय में रावत के लिये भी ‘कुछ’ बचाकर नहीं गए हैं। जैसा कि कथित स्टिंग में दिखा। रावत लाचारगी के साथ कह रहे थे, मेरे पास कुछ नहीं है, ऊपर वाले भी ‘कंगले’ बैठे हैं। और बमुश्किल अपना हाथ उठाकर इशारा कर शायद बता रहे थे, मेरे पास तो पांच करोड़ रुपए ही हैं। हां, बाद में ‘टॉप-अप’ जरूर करवा देंगे।
जनता की याददास्त कमजोर होती है। लेकिन, बहुगुणा की सरकार बनने के दौरान एक हफ्ते तक दिल्ली में पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर चले राजनीतिक ड्रामे की यादें अभी बहुत पुरानी भी नहीं पड़ी हैं, जिसकी हल्की झलक हरीश रावत की ताजपोशी के दिन सतपाल महाराज ने भी दिखाई थी। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि रावत के राजनीतिक प्रतिवार के फलस्वरूप न केवल सतपाल की जल्द ही कांग्रेस से विदाई हुई, वरन मजबूरी में मंत्री बनाई गई उनकी धर्मपत्नी अमृता रावत को भी मंत्रिमंडल से विदा कर दिया गया। याद रखना होगा, अमृता ही एकमात्र मंत्री थी, जिन्हें कांग्रेस की बहुगुणा व रावत सरकारों से हटाया गया। वहीं शपथ ग्रहण समारोह में ही रावत समर्थकों के ‘कंधों पर झूलते’ हुए ‘दिन-दहाड़े’ दिखाए ‘चाल-चरित्र’ की झलक के चर्चे भी आम रहे, जिस पर आगे टीवी चैनलों ने उनके कार्यकाल के लिए ‘राव‘त’ राज’’ का एक अक्षर बदलकर ‘रावण राज’ कहने जैसी अतिशयोक्तिपूर्ण टिप्पणी भी की।

वह गूल में पानी ना आने पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की अदा….

अपने शुरुआती राजनीतिक दौर में अपनी समस्याएं बताने वाले लोगों को तत्काल पत्र लिखकर समाधान कराने का वादा करना, तब हरीश चंद्र सिंह रावत के नाम से पहचाने जाने वाले रावत का लोगों को अपना मुरीद बनाने का मूलमंत्र रहा। अपने खेत में पानी की गूल से पानी न आने की शिकायत करने वाले ग्रामीण को उनका तीसरे दिन ही पोस्टकार्ड से जवाब आ जाता कि उन्हें लगा है कि गूल में पानी आपके नहीं मेरी गूल में नहीं आ रहा है। उन्होंने शिकायत को सिंचाई विभाग के जेई, एई, ईई, एसई से लेकर राज्य के सिंचाई मंत्री, मुख्यमंत्री के साथ ही केंद्रीय सिंचाई मंत्री और प्रधानमंत्री को भी सूचित कर दिया है। गूल में पानी कभी ना आता, लेकिर ग्रामीण पत्र प्राप्त कर ही हरीश का मुरीद बन जाते।

विरोध, विरोध और विरोध….

उत्तराखंड आंदोलन के दौरान हरीश की पहचान उत्तराखंड राज्य विरोधी की भी बनी, जिसके परिणामस्वरूप 1989 के चुनावों के लिए नामांकन कराने के लिए उन्हें मात्र चार-छह समर्थकों के साथ कमोबेश चुपचाप आना पड़ा था। बाद के वर्षों में हरीश की अपने अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में ब्राह्मणद्रोही क्षत्रिय नेता की छवि बनती चली गई, जिसका परिणाम उन्हें अपनी हार की हैट-ट्रिक और पत्नी की भी हार के बाद अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र का रण छोड़ने पर विवश कर गया। राज्य के ब्राह्मण नेता तिवारी और बहुगुणा का लगातार विरोध करने से भी उनकी इस ब्राह्मण विरोधी छवि का विस्तार ही हुआ। इसी का परिणाम है कि उन्होंने राज्य की कुर्सी प्राप्त भी की तो नारायण दत्त तिवारी के राज्य की राजनीति से दूर जाने के बाद।

जानें कौन और क्या हैं हरीश रावत

हरीश रावत उत्तराखंड में कांग्रेस के सबसे कद्दावर व मंझे हुए राजनेताओं में शामिल रहे हैं। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही जनता के दुलारे इस राजनेता का ऐसा आकर्षण था, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने सबसे कम उम्र में ब्लाक प्रमुख बनने का रिकार्ड बनाया। हालांकि बाद में निर्धारित से कम उम्र का होने के कारण उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों पर भिकियासेंण के ब्लाक प्रमुख के पद से हटना पड़ा था।
27 अप्रैल 1947 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले के ग्राम मोहनरी पोस्ट चौनलिया में स्वर्गीय राजेंद्र सिंह रावत व देवकी देवी के घर जन्मे रावत की राजनीतिक यात्रा एलएलबी की पढ़ाई के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय जाने से शुरू हुई। यहां वह रानीखेत के कांग्रेस विधायक व यूपी सरकार में कद्दावर मंत्री गोविंद सिंह मेहरा के संपर्क में आए, और गांव में एक पत्नी के होते हुए रावत ने रेणुका से दूसरा विवाह किया। यहीं संजय गांधी की नजर भी उन पर पड़ी, जिन्होंने तभी उनमें भविष्य का नेता देख लिया था, और केवल 33 वर्ष के युवक हरीश को 1980 में कांग्रेस पार्टी का न केवल सक्रिय सदस्य बनाकर, वरन लोक सभा चुनावों में अल्मोड़ा संसदीय सीट से कांग्रेस-इंदिरा का टिकट दिलाने के साथ ही कांग्रेस सेवादल की जिम्मेदारी भी सोंप दी। इस चुनाव में हरीश ने गांव से निकले एक आम युवक की छवि के साथ बाद में भाजपा के त्रिमूर्तियों में शुमार व तब भारतीय लोक दल से तत्कालीन सांसद प्रोफेसर डा. मुरली मनोहर जोशी के विरुद्ध 50 हजार से अधिक मतों से बड़ी पटखनी देकर भारतीय राजनीति में एक नए ‘धूमकेतु’ के उतरने के संकेत दे दिए। जोशी को मात्र 49,848 और रावत को 1,08,503 वोट मिले। आगे 1984 में भी उन्होंने जोशी को हराकर अल्मोड़ा सीट छोड़ने पर ही विवश कर दिया। 1989 के चुनावों में उक्रांद के कद्दावर नेता काशी सिंह ऐरी निर्दलीय और भगत सिंह कोश्यारी भाजपा के टिकट पर उनके सामने थे। यह चुनाव भी रावत करीब 11 हजार वोटों से जीते। रावत को 1,49,703, ऐरी को 1,38,902 और कोश्यारी को केवल 34,768 वोट मिले, और यही कोश्यारी रावत से 12 वर्ष पहले उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। आगे वह युवा कांग्रेस व कांग्रेस की ट्रेड यूनियन के साथ ही 2000 से 2007 तक उत्तराखंड कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इस बीच 2002 में वह राज्य सभा सांसद के रूप में भी संसद पहुंचे।
उत्तराखंड आंदोलन के दौर में हरीश रावत उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वह राज्य विरोधी रहे। कहते हैं कि इसी कारण 1989 के लोक सभा चुनावों के लिए उन्हें जनता के विरोध को देखते हुए अल्मोड़ा में नामांकन कराने के लिए भी चुपचाप अकेले आना पड़ा। लेकिन इस चुनाव में उक्रांद के काशी सिंह ऐरी को हराने के बाद राजनीतिक चालबाजी दिखाते हुए अचानक अपने सिपहसालार किशोर उपाध्याय के साथ उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन कर खुद को राज्य आंदोलन से जोड़ते हुए एक तरह से राज्य आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। हालांकि इस दौरान भी वह राज्य से पहले केंद्र शासित प्रदेश की मांग पर बल देते रहे। आगे रामलहर के दौर में रावत भाजपा के नए चेहरे जीवन शर्मा से करीब 29 हजार वोटों से सीट गंवा बैठे। इसके साथ ही विरोधियों को मौका मिल गया, जो उनकी राजनीतिक छवि एक ब्राह्मण विरोधी छत्रिय नेता की बनाते चले गए, जिसका नुकसान उन्हें बाद में केंद्रीय मंत्री बने भाजपा नेता बची सिंह रावत से लगातार 1996, 1998 और 1999 में तीन हारों के रूप में झेलना पड़ा। 2004 के लोक सभा चुनावों में हरीश की पत्नी रेणुका को भी बची सिंह रावत ने करीब 10 हजार मतों के अंतर से हरा दिया। लेकिन इन विपरीत हालातों को भी वह अपने पक्ष में मोड़ने में सफल रहे। 2009 के चुनावों में रावत ने एक असाधारण फैसला करते हुए दूर-दूर तक संबंध रहित प्रदेश की हरिद्वार सीट से नामांकन करा दिया, जहां समाजवादी पार्टी से उनकी परंपरागत सीट रिकार्ड 3,32,235 वोट प्राप्त कर छीन ली, और इस तरह उनका एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ के रूप में राजनीतिक पुर्नजन्म हुआ। इसी जीत के बाद उन्हें केंद्र सरकार में पहले श्रम राज्यमंत्री बनाया गया, और आगे केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनका कद बढ़ता चला गया। वर्ष 2011 में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग में राज्य मंत्री, तथा बाद में ससंदीय कार्य राज्य मंत्री के बाद 2012 में वह जल संसाधन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। इस दौरान वह लगातार विपक्ष के हमले झेल रही यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी के ‘फेस सेवर’ की दोहरी जिम्मेदारी निभाते रहे। अनेक बेहद विषम मौकों पर जब पार्टी के कोई भी नेता मीडिया चौनलों पर आने से बचते थे, रावत एक ही दिन कई-कई मीडिया चौनलों पर अपनी कुशल वाकपटुता और तर्कों के साथ पार्टी और सरकार का मजबूती से बचाव करते थे। इस तरह वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समक्ष उत्तराखंड के सबसे विश्वस्त और भरोसेमंद राजनेता बनने में सफल रहे। शायद इसी का परिणाम रहा कि 2002 और 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को प्रदेश में सत्ता तक पहुंचाने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाने वाले हरीश रावत के राजनीतिक कौशल की हाईकमान अधिक दिनों तक अनदेखी नहीं कर पाया, और लोक सभा चुनावों के विपरीत नजर आ रहे हालातों में रावत के हाथों में ही संकटमोचक के रूप में उत्तराखंड राज्य की सत्ता सोंपी गई।

 

स्याह पक्ष:

गांव में एक पत्नी के होते हुए रावत ने रेणुका से दूसरा विवाह किया। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वह राज्य विरोधी रहे। इसी कारण 1989 के लोक सभा चुनावों के लिए उन्हें जनता के विरोध को देखते हुए अल्मोड़ा में नामांकन कराने के लिए भी चुपचाप अकेले आना पड़ा। लेकिन इस चुनाव में उक्रांद के काशी सिंह ऐरी को हराने के बाद राजनीतिक चालबाजी दिखाते हुए अचानक उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन कर खुद को राज्य आंदोलन से भी जोड़ लिया। हालांकि इस दौरान भी वह राज्य से पहले केंद्र शासित प्रदेश की मांग पर बल देते रहे। अल्मोड़ा के सांसद रहते वह ब्राह्मण विरोधी क्षत्रिय नेता बनते चले गए, जिसका खामियाजा उन्हें बाद में स्वयं की हार की तिकड़ी और पत्नी रेणुका की भी हार के साथ अल्मोड़ा छोड़ने के रूप में भुगतना पड़ा। आगे प्रदेश में पंडित नारायण दत्त तिवारी और विजय बहुगुणा सरकारों को लगातार स्वयं और अपने समर्थक विधायकों के भारी विरोध के निशाने पर रखा, और अपनी ब्राह्मण विरोधी क्षत्रिय नेता और सत्ता के लिए कुछ भी करने वाले नेता की छवि को आगे ही बढ़ाया। केंद्र में श्रम एवं सेवायोजन, कृषि एवं खाद्य प्रसंसकरण तथा जल संसाधन मंत्री रहे, लेकिन इन मंत्रालयों के जरिए प्रदेश के बेरोजगारों को रोजगार, कृषि व फल उत्पादों को बढ़ावा देने तथा जल संसाधनों के सदुपयोग की दिशा में उन्होंने एक भी उल्लेखनीय कार्य राज्य हित में नहीं किया।

मुख्यमंत्री हरीश रावत का राजनीतिक लेखा-जोखा

चुनाव लोक सभा क्षेत्र         जीते                                                हारे
1980 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस-ई (108530) मुरली मनोहर जोशी-भाजपा(49848)
1884 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस (185006)         मुरली मनोहर जोशी-भाजपा(44674)
1989 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस (149703)         काशी सिंह ऐरी-निर्दलीय (138902)
1991 अल्मोड़ा जीवन शर्मा-भाजपा (149761)         हरीश रावत-कांग्रेस (120616)
1996 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (161548) हरीश रावत-कांग्रेस (104642)
1998 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (228414) हरीश रावत-कांग्रेस (146511)
1999 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (192388)   हरीश रावत-कांग्रेस (180920)
2004 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (225431)   रेणुका रावत-कांग्रेस (215568)
2009 हरिद्वार हरीश रावत -कांग्रेस (332235)        स्वामी यतींद्रानंद गिरि-भाजपा (204823)
(यह पोस्ट उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के बारे में अधिकाधिक जानकारी देने के उद्देश्य से तैयार की गई है।)

नेहरू के बहाने: सोनिया-राहुल से भी आगे निकलने की कोशिश में हरीश रावत

नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शुरू होकर भाजपा और राजग को भी कांग्रेस के सम्मेलन में न बुलाने को लेकर ‘नेहरू के बहाने’ शुरू हुई बहस में अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी कूद पड़े हैं। मौका भुनाते हुए रावत ने कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के न केवल सुरों में सुर मिलाए हैं, वरन उनसे भी आगे निकलने की कोशिश की है। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा नेहरू के व्यक्तित्व को खंडित करने की कोशिश की जा रही है, पर यह असंभव है। लेकिन उनकी (नेहरू की) विचारधारा को खंडित करने की बड़ी चिंता है। कुछ लोग (नाम लिए बिना) नेहरू द्वारा रखी गई गांव आधारित योजनागत विकास की बुनियाद को हिलाने, कमजोर करने में लगे हैं। वह इसकी जगह कॉरपोरेट की बात करते हैं। कांग्रेसजनों को इससे सावधान रहना है। कहा, ऐसी कोशिशों को बर्दास्त नहीं किया जाएगा और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

श्री रावत ने यह बात शुक्रवार को नैनीताल क्लब स्थित शैले हॉल में देश के प्रथम राष्ट्रपति जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस-बाल दिवस के अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण करने के उपरांत कही। कहा, 125वीं जयंती पर नेहरू जी की प्रासंगिकता उनके जीवन काल से भी अधिक बढ़ गई है। नेहरू जी ने गांधी जी के समरसता, सर्वधर्म सम्भाव व धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लिया था। आज देश ने जो भी प्रगति की है, उसकी नींव नेहरू जी ने ही रखी थी। वह सांप्रदायिकता के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने ही देश को योजनागत विकास का मॉडल दिया था, और अंग्रेजों की गुलामी से छूटे देश को दुनिया की पांचवी औद्योगिक शक्ति के रूप में स्थान दिलाया था, तथा अपने देश को आजादी दिलाने के साथ ही 150 अन्य देशों को भी आजादी की राह दिखाकर रूस व अमेरिका के सामने तीसरी विश्व शक्ति खड़ी की थी। उन्होंने ही बोकारो से लेकर भिलाई और दुर्गापुर से लेकर भाखड़ा बांध बनाकर उद्योगों, ऊर्जा जरूरतों और सिंचाई की परियोजनाएं शुरू की थीं। भाभा एटोमिक प्लांट बनाया था, जिससे हम बाद में इंदिरा गांधी के दौर में अणुशक्ति बने। उन्होंने ही अंतरिक्ष मिशन की नीव रखी थी, जिसके प्रतिफल में आज हम चंद्रयान, मंगलयान भेजने में सफल रहे हैं।

बिना बच्चों ने मनाया बाल दिवस

नैनीताल। बाल दिवस के अवसर पर कांग्रेसजनों ने शैले हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया था, लेकिन कार्यक्रम में एक भी बच्चे को नहीं बुलाया गया था। ऐसे में स्वयं सीएम ने ही पहल करते हुए खुद बच्चों की तरह ‘चाचा नेहरू जिंदाबाद” के नारे लगाए, जबकि इसके प्रतिफल में पार्टी जन ‘हरीश रावत जिंदाबाद” के नारे ही लगाते रहे।

19 तक जारी रहेंगे बाल दिवस के कार्यक्रम

नैनीताल। प्रदेश में बाल दिवस के कार्यक्रम आगामी 19 नवंबर तक जारी रहेंगे। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि इस अवधि तक कहा कि आगे 19 नवंबर तक कांग्रेस जन नेहरू जी की याद में जगह-जगह पर कार्यक्रम करेंगे तथा गांव-गांव, ब्लाक-ब्लॉक, गरीबों और अल्पसंख्यकों के बीच जाकर बताएंगे कि वह उनके साथ दृढ़ता के साथ खड़े हैं।

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यह क्या अजीबोगरीब हो रहा हरीश सरकार में !

हरीश रावत के आते ही तीन ‘रावत’ निपटे 
उत्तराखंड में जब से हरीश रावत के नेतृत्व में सरकार बनी है, बहुत कुछ अजीबोगरीब हो रहा है। विरोधियों को ‘विघ्नसंतोषी’ कहने और उनसे निपटने में महारत रखने वाले रावत के खिलाफ मुंह खोल रहे और खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता रहे तीन रावत (सतपाल, अमृता और हरक) निपट चुके हैं। सतपाल व अमृता के खिलाफ विपक्ष ने अपने परिजनो को पॉलीहाउस बांटने में घोटाले का आरोप लगाया, और सीबीआई जांच की मांग उठाई है। हरक का नाम दिल्ली की लॉ इंटर्न ने छेड़खानी का मुक़दमा दर्ज कराकर ख़राब कर दिया है। बचा-खुचा नाम भाजपाई हरक को ‘बलात्कारी हरक सिंह रावत’ बताकर और उनका पुतला फूंक कर ख़राब करने में जुट गए हैं। रावत ने पहले ही उनके पसंदीदा कृषि महकमे की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गैर विधायक तिलक राज बेहड़ को मंत्री के दर्जे के साथ देकर जोर का झटका धीरे से दे दिया था। विपक्ष के ‘मुंहमांगे’ से अविश्वाश प्रस्ताव से हरीश सरकार पहले ही छह मांह के लिए पक्की हो ही चुकी है। अब यह समझने वाली बात है कि विरोधी खुद-ब-खुद निपट रहे और रावत की राह स्वतः आसान होती जा रही है कि यह रावत के राजनीतिक या कूटनीतिक कौशल का कमाल है। 

माँगा गाँव-मिला शहर  

हरीश रावत सरकार आसन्न त्रि-स्तरीय पंचायत व लोक सभा चुनावों की चुनावी बेला में अनेक अनूठी चीजें कर रही हैं। अचानक राज्य के सब उत्तराखंडी लखपति हो गए हैं। सरकार ने बताया है, राज्य की प्रति व्यक्ति आय 1,12,000 रुपये से अधिक हो गयी है। सांख्यिकी विभाग ने आंकड़ों की बाजीगरी कर कर सिडकुल में लगे चंद उद्योगों के औद्योगिक घरानों की आय राज्य की जीडीपी में जोड़कर यह कारनामा कर डाला है।
दूसरे संभवतया देश में ही ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य में पंचायत चुनावों की अधिसूचना 1 मार्च को और चुनाव आचार संहिता 2 मार्च से जारी होने वाली है और चुनावों के लिए नामांकन पत्रों की बिक्री इससे एक सप्ताह पहले 24 फरवरी से ही शुरू हो गयी है।
तीसरे राज्य के वन क्षेत्र सीधे ही शहर बन गए हैं। लालकुआ के पास पूरी तरह वन भूमि पर बसे बिन्दुखत्ता को राज्य कैबिनेट ने जनता की राजस्व गाँव घोषित करने की मांग से भी कई कदम आगे बढ़कर एक तरह के बिन मांगे ही स्वतंत्र रूप से नगर पालिका बनाने की घोषणा कर दी है, वहीँ इसी तरह के दमुवाढूंगा को सीधे हल्द्वानी नगर निगम का हिस्सा बनाने की घोषणा कर दी गयी है।

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10 जनपथ की नाकामी अधिक है बहुगुणा की वापसी

उत्तराखंड में आयी दैवीय आपदा का आख़िरी पीड़ित

अपने दो वर्ष से भी कम समय में ही उत्तराखड की सत्ता से च्युत हुए विजय बहुगुणा की मुख्यमन्त्री पद से वापसी न केवल उनकी वरन 10 जनपथ की नाकामी अधिक है। 2010 के बाद दोबारा मार्च 2012 में विधायक दल की स्वाभाविक पसंद की अनदेखी के बावजूद उन्हें राज्य पर थोपे जाने  का ही नतीजा है कि बहुगुणा अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही कमोबेश हर दिन सत्ता से आते-जाते रहे और एक जज के बाद एक सांसद और अब मुख्यमंत्री के रूप में भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं.  तथा अपना नाम डुबाने के साथ ही अपने पिता के नाम पर भी दाग लगा चुके हैं, और कांग्रेस को भी केदारनाथ आपदा के दौरान अपने निकृष्ट कुप्रबंधन से न केवल उत्तराखंड वरन पूरे देश में नुकसान पहुंचा चुके हैं।
याद रखना होगा कि बहुगुणा की ताजपोशी 10 जनपथ को 500 करोड़ रुपए की थैली पहुंचाए जाने का प्रतिफल बताई गई थी। शायद तभी उन्हें पूरे देश को झकझोरने वाली उत्तराखंड में आई जल प्रलय की तबाही में निकृष्ट प्रबंधन की नाकामी और चारों ओर से हो रही आलोचनाओं के बावजूद के बावजूद नहीं हटाया गया। और अब हटाया भी गया है तो तब , जब तमाम ओपिनियन पोल में कांग्रेस को आगामी लोक सभा चुनावों में उत्तराखंड में पांच में से कम से कम चार सीटों पर हारता बताया जा रहा है, और आसन्न पंचायत चुनावों में भी कांग्रेस की बहुत बुरी हालत बताई जा रही है।

अब तो बस यह देखिये कि बहुगुणा के लिए 13 का अंक शुभ होता है या नहीं….

“चिंता न करें, जल्द मान जाऊँगा…” शायद यही कह रहे हैं हरीश रावत, उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा से
दोस्तो आश्चर्य न करें, कांग्रेस पार्टी में बिना पारिवारिक पृष्ठभूमि के कोई नेता मुख्यमंत्री बनना दूर आगे भी नहीं बढ़ सकता…बहुगुणा की ताजपोशी पहले से ही तय थी, बस माहौल बनाया जा रहा था….
विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का सीएम बनाना कांग्रेस हाईकमान ने चुनावों से पहले ही तय कर लिया था. इसकी शुरुवात तब के पराजित भाजपा सांसद प्रत्यासी रहे अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा को कांग्रेस में शामिल कराया गया था, ताकि बहुगुणा को सीएम बनाये जाने पर पौड़ी सीट खली हो तो वहां से जसपाल को चुनाव लड़ाया जा सके. तब इसलिए उनका नाम घोषित नहीं किया गया कि पार्टी के अन्य क्षत्रप पहले ही (अब की तरह) न बिदक जाएँ. 6 मार्च को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी नाम घोषित नहीं किया, ताकि सीएम पद का ख्वाब पाल रहे दावेदार बहुमत के लिए जरूरी निर्दलीयों व उक्रांद का समर्थन हासिल कर लायें.  क्षत्रप 36 का आंकड़ा तो हासिल कर लाये, पर यहाँ पर एक गड़बड़ हो गयी. निर्दलीय अपने आकाओं को सीएम बनाने की मांग उठा कर एक तरह से हाईकमान को आँख दिखाने लगे, इस पर हाईकमान को एक बार फिर बहुगुणा को सीएम बनाने की घोषणा टालनी पडी. अब प्रयास हुए बसपा का समर्थन हासिल करने की, बसपा के कथित तौर पर दो विधायक कांग्रेस में आने को आतुर थे, ऐसे में तीसरा भी क्यों रीते हाथ बैठता. ऐसे में बसपाई 12 मार्च को राजभवन जा कर कमोबेश बिन मांगे कांग्रेस को समर्थन का पत्र सौंप आये. अब क्या था, तत्काल ही कांग्रेस हाईकमान ने बहुगुणा के नाम की घोषणा कर दी. इसके तुरंत बाद हरीश रावत गुट ने दिल्ली में जो किया, उससे कांग्रेस में बीते सात दिनों से ‘आतंरिक लोकतंत्र’ के नाम पर चल रहे विधायकों की राय पूछने के ड्रामे की पोल-पट्टी खुल गयी.
सच्चाई है कि कांग्रेस हाईकमान के विजय बहुगुणा को सीएम घोषित करने का एकमात्र कारण था उनका पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा का पुत्र होना. स्वयं परिवारवाद पर चल रहे कांग्रेस हाईकमान के लिए अपनी इस मानसिकता से बाहर निकलना आसान न था, रावत समर्थक सांसद प्रदीप टम्टा कह चुके हैं की बहुगुणा को कांग्रेस के बड़े नेता किशोर उपाध्याय को निर्दलीय दिनेश धने के हाथों हराकर पार्टी की ‘पीठ में छुरा भौकने’ का इनाम मिला है, जबकि रावत कांग्रेस की ‘छाती में वार’ करने चले थे. सो आगे उनका ‘कोर्टमार्शल’ होना तय है, कब होगा-इतिहास बतायेगा.     हरीश रावत और उनके समर्थक नेता इस बात को जितना जल्दी समझ लें बेहतर होगा..
किसी भ्रम में न रहें, कुछ भी आश्चर्यजनक या अनपेक्षित नहीं होने जा रहा है, बन्दर घुड़की दिखाने के बाद दोनों रावत (हरीश-हरक) व टम्टा आदि हाईकमान की ‘दहाड़’ के बाद चुप होकर फैसले को स्वीकार कर लेंगे, किसी शौक से नहीं वरन इस फैसले को ही नियति मानकर, आखिर उनका इस पार्टी के इतर अपना कोई वजूद भी तो नहीं है.
अब तो बस यह देखिये कि 13 मार्च को प्रदेश के सीएम पद की शपथ ग्रहण करने वाले बहुगुणा के लिए 13 का अंक पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की तरह पूर्व मान्यताओं के इतर शुभ होता है या नहीं….बहरहाल खंडूडी के बाद उनके ममेरे भाई में प्रदेश की जनता एक धीर-गंभीर मुख्यमंत्री देख रही है..

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10 responses to “हरीश रावत : यह हश्र तय ही था शायद !

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