कुमाउनी ऐपण: शक, हूण सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की भी मिलती है झलक


Aipan
नवीन जोशी, नैनीताल। लोक कलाएं संबंधित क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ ही उस संस्कृति के उद्भव और विकास की प्रत्यक्षदर्शी भी होती हैं। उनकी विकास यात्रा में आने-जाने वाली अन्य संस्कृतियों के प्रभाव भी उनमें समाहित होती हैं इसलिए वह अपनी विकास यात्रा की एतिहासिक दस्तावेज भी होती हैं। कुमाऊं के लोकशिल्प के रूप में ऐपण तथा पट्टालेखन का भी ऐसा ही विराट इतिहास है, जिसमें करीब चार हजार वर्ष पुरानी शक व हूण जैसी प्राचीन सभ्यताओं के साथ ही तिब्बत, महाराष्ट्र, राजस्थान व बिहार की लोक चित्रकारी की झलक भी मिलती है।

पुराणों में मिलते हैं कुमाउनी ऐपण विधा के मूल संदर्भ

कुमाउनी ऐपण विधा के मूल संदर्भ पुराणों में मिलते हैं। उदाहरण के लिए विवाह के अवसर पर प्रयुक्त की जाने वाली धूलिअर्घ्य चौकी का पूरा विवरण शिव पुराण और विष्णु पुराण में अनुग्रह यंत्र के रूप में मिलता है। वहीं इस विधा पर सबसे पुरानी पुस्तक अल्मोड़ा में शिक्षक रहे नाथू राम जी की बताई जाती है। यहां नैनीताल में ऐपण विधा को बचाने के प्रमाणिक प्रयास 1971 में शारदा संघ संस्था के द्वारा कार्यशाला एवं प्रतियोगिताएं आयोजित करने के रूप में हुए। इन कार्यशालाओं में किशोरियों-युवतियों को ऐपण विधा को उनके मूल स्वरूप में बनाना सिखाया जाता था। जैसे लक्ष्मी चौकी में मूलतः दो त्रिभुजों का आपस में मिला कर एक तारा बनाया जाता है। यह दो त्रिभुज प्रकृति एवं पुरुष के संयुक्त रूप के द्योतक हैं। साथ ही लक्ष्मी के पैर बनाए जाते हैं। वहीं सरस्वती चौकी भी कमोबेस लक्ष्मी चौकी जैसी ही बनाई जा सकती है, किंतु उसमें लक्ष्मी के पैरों की आकृति नहीं बनाई जाती है। नव दुर्गा की चौकी नौ स्वास्तिक निसानों के साथ बनाई जाती है। इसी तरह शिव की पीठ आठ बिंदुओं के वर्ग के भीतर द्वि ज्यामितीय (2 Dimensional) आधार पर शिव को स्थापित किया जाता है, जोकि त्रि ज्यामितीय (3 Dimensional) अनुभव करने पर यह चार द्वारों से युक्त वेदी पर शिव के लिए आसन जैसा नजर आता है। शिव चौकी में बेदी के बाहर की ओर अष्ट कमलों की आकृति भी बनाई जाती है, जिन्हें आठों दिशाओं के दिग्पालों को आह्वान कर अवस्थापित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। कुमाऊं में परंपरागत तौर पर तंत्र आधारित पूजा पद्धतियों का प्राविधान है, जिनमें अलग-अलग देवताओं का आह्वान करते समय उन्हें आसन देने के लिए खास तरह की ऐपण चौकियां बनाई जाती हैं। इस तरह यह समझना भी आवश्यक है कि ऐपण केवल एक लोक कला नहीं वरन कुमाऊं अंचल में होने वाली तांत्रिक पूजा (ॐ  एँ ह्रीं क्लीं प्रकार की) में देवगणों-देवियों का आह्वान कर उन्हें आसन देने के लिए प्रदान की जाने वाली चौकियां हैं।  शिव व विष्णु पुराण सहित अनेक पुराणों में भी इन चौकियों का वर्णन आता है। तिब्बत में भी इसी तरह की जमीन पर विशाल आकार की ‘किंखोर” कही जाने वाली चौकियां बनाई जाती हैं।

1971 में ऐपण विधा के समाप्त होने का अंदेशा होने पर शारदा संघ के संस्थापक सदस्य के रूप में चंद्र लाल साह ने ऐपण प्रतियोगिता की शुरुआत की थी। बीते करीब डेढ़ दशक से शारदा संघ की प्रतियोगिता समाप्त हो गई, इसके बाद उनके पुत्र राजेंद्र लाल साह ने चंद्र लाल साह मेमोरियल सोसायटी के तहत वृंदावन स्कूल शुरू होने पर 2010 में अंतर विद्यालयी ऐपण प्रतियोगिता शुरु की।

उल्लास को प्रकट करते हैं ऐपण

त्योहारो, पर्वों तथा मानव जीवन के विभिन्न शुभ-संस्कार अवसरों पर कुमाउनी महिलाओं का उल्लास अलंकार आलेखन-ऐपण के रूप में प्रकट होता है। सुबह स्नानोपरांत महिलाएं लाल, गाढ़ी मिट्टी एवं गोबर से घर की लिपाई करती हैं। रसोईघर की लिपाई हर रोज भोजन तैयार करने के बाद नियमपूर्वक की जाती है। दीवारों एवं द्वार पर ऐपण के रूप में पांच, सात अथवा नौ के समूह में अंगुलियों से खड़ी लकीरें बनाई जाती हैं, जिन्हें वसुधारा कहा जाता है। घर के देवस्थान में बनी वेदी की लिपाई कर उसे सुंदर ऐपण-आलेखनों से सजाया जाता है। ऐपण तथा आलेखन के लिए पहली शाम से भीगे चावलों को सिल-बट्टे पर पीस कर और पानी में घोल हल्का गाढ़ा ‘विश्वार’ बनाया जाता है। नवागत शिशु को सूर्य दर्शन कराने पर सूर्य चौकी, छठी एवं नामकरण संस्कार पर लकड़ी की चौकी को लाल मिट्टी से लीप कर से विश्वार से ऐपण बनाकर ‘जनमबार चौकी’ बनाई जाती है। इसी तरह उपनयन, विवाह और आखिरी अंतिम संस्कार में भी संस्कार करने की भूमि को पवित्र करने के लिए लिपाई और आलेखन किया जाता है।
रक्षाबंधन एवं उपनयन संस्कार पर ‘उपनयन चौकी’ बनाने का प्राविधान है। विवाह पर पूजा स्थल में वर अथवा वधू के माता-पिता यानी यजमान दंपति के बैठने के लिए ‘दोहरी चौकी’, कन्या पक्ष के आंगन में वर के स्वागत के लिए ‘धूलिअर्घ्य चौकी’, देव पूजन एवं गणेश पूजन के लिए ‘विवाह चौकी’, कन्यादान के लिए बेटी के वस्त्राभूषण रखने के लिए ‘कन्यादान चौकी’, तथा वर एवं आचार्य के लिए पीले रंग की चौकी में विभिन्न रंगों के आलेखन होते हैं। इस मौके पर चौकी को कच्ची हल्दी से रंगकर रोली (पिठ्यां) के रंग से महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, गणेश, सूर्य, चंद्रमा, सोलह मात्रिका देवियों, पांच बेल-बूटे एवं हिमालय के प्रतीकों से युक्त मातृका चौकी भी बनाई जाती है। बेल-बूटे, बरगद का पेड़, अष्टकमल, दो तोते तथा बीच में राधा कृष्ण, सूर्य, चंद्रमा, शिव के प्रतीक सांप व 15 से 25 कर बिंदुओं (भित्ति चित्रों) से युक्त ज्योति पट्टा, बनाया जाता है। दीपावली पर शुभ लक्ष्मी चौकी तथा घर के बाहर से लेकर प्रत्येक द्वार से होते हुए हर कमरे और खासकर मंदिर तक माता लक्ष्मी के पग बनाए जाते हैं। गोवर्धन पूजा पर ‘गोवर्धन पट्टा’ तथा कृष्ण जन्माष्टमी पर ‘जन्माष्टमी पट्टे’ बनाए जाते हैं। नवरात्र में ‘नवदुर्गा चौकी’ तथा कलश स्थापना के लिए नौ देवियों एवं देवताओं की सुंदर आकृतियों युक्त ‘दुर्गा थापा’ बनाया जाता है। इसके अलावा भी महिलाएं प्रत्येक सोमवार को शिव व्रत के लिए ‘शिव-शक्ति चौकी’ बनाती हैं। सावन में पार्थिव पूजन के लिए ‘शिवपीठ चौकी’ तथा व्रत में पूजा-स्थल पर रखने के लिए कपड़े पर ‘शिवार्चन चौकी’ बनाई जाती है। वहीं इतिहासकारों के अनुसार कुमाउनी लोक कला ऐपण एवं भित्ति चित्रों में ईसा से करीब दो सहस्त्राब्दि पूर्व कुमाऊं के मूलवासी रहे हूण एवं शकों की संस्कृति के साथ ही राजस्थान, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार एवं तिब्बत के भी कुछ प्रभाव दिखते हैं। साथ ही इस कला में यहां के लोगों की कलात्मक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी होती है। वीणा की लहरों, फूल मालाओं, सितारों, बेल-बूटों व स्वास्तिक चिन्ह में समरूपता से इनमें तांत्रिक प्रभाव भी दृष्टिगोचर होते हैं। साथ ही अलग-अलग प्रकार के ऐपण तैयार करते समय के लिए अनेक मंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है, तभी ऐपण आलेखन का अभीष्ट पूर्ण होता है।

ऐपण संबंधी चित्र:

डा. यशोधर मठपाल की कुमाउनी लोक चित्रकारी

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