स्कॉटलेंड से गहरा नाता रहा है कुमाऊं और उत्तराखंड का 


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    132 वर्ष के अंग्रेजी राज में 70 वर्ष रहे स्कॉटिश मूल के कमिश्नर ट्रेल, बेटन व रैमजे, अपने घर की तरह मानते थे उत्तराखंड को, उन्होंने परंपरागत कानूनो को दी महत्ता, स्थानीय लोक संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं का रखा खयाल, इसीलिए उत्तराखंड में हुआ अंग्रेजों का कम विरोध

नवीन जोशी, नैनीताल। ब्रिटेन के साथ ही रहने के पक्ष में जनमत देने वाले स्कॉटलेंड का उत्तराखंड से गहरा नाता रहा है। पर्वतीय भौगोलिक बनावट के साथ स्कॉटलेंड एवं उत्तराखंड के लोगों में सांस्कृतिक व वैचारिक समानता भी बताई जाती है। संभवतया इसी कारण भारत पर आधिपत्य के दौर में स्कॉटलेंड मूल के अंग्रेजों ने अपनी तैनाती उत्तराखंड में करवाई, और यहीं अपनी बस्तियां भी बसाईं। यहां 132 वर्ष के अंग्रेजी राज में से आधे से अधिक यानी 70 वर्ष की अवधि में कमिश्नर रहे जीडब्लू ट्रेल, जेएच बेटन व सर हेनरी रेमजे स्कॉटिश मूल के ही थे। उन्होंने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यताओं को पूरा महत्व दिया, एवं यहां की परंपराओं को ‘कस्टमरी लॉज’ के रूप में कानूनी मान्यता दी। शायद, यही कारण रहा कि पूरे देश में जहां अंग्रेजों के खिलाफ जहां उन्हें देश से बाहर खदेड़ने के लिए विद्रोह हुए, व आजादी की लड़ाई लड़ी गई, लेकिन उत्तराखंड इससे न केवल कमोबेश अछूता रहा, वरन यहां के कमिश्नर ट्रेल, बेटन व रेमजे के नाम आज भी यहां इज्जत के साथ लिये जाते हैं।

Henry Ramsey
Henry Ramsey

उत्तराखंड पर अंग्रेजों का आधिपत्य 1815 में सिघौली की संधि के उपरांत हुआ था। तब तक यहां नेपाल के गोरखाओं का बेहद दमनकारी शासन था। यूं गार्डनर कुमाऊं के पहले कमिश्नर रहे, लेकिन उनका अधिकांश कार्यकाल नेपाल में गोरखाओं के साथ मतभेदों को निपटाने में रहा, ऐसे में गढ़वाल के कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल ही कुमाऊं की भी यानी पूरे उत्तराखंड की जिम्मेदारी संभाले रहे। बाद में उन्हें ही कुमाऊं का दूसरा कमिश्नर बनाया गया। वह स्कॉटलेंड मूल के थे। उनके नाम पर ही हिमालय का ‘ट्रेल पास’ दर्रा प्रसिद्ध है। उन्होंने ही उत्तराखंड का पहला ‘लेंड सेटलमेंट’ करवाया था। बताया जाता है कि इसी सिलसिले में वह 1823 में नैनीताल आने वाले पहले अंग्रेज थे। नैनीताल में देवी का मंदिर था, लिहाजा स्थानीय लोग इसे बेहद पवित्र स्थान मानते थे। देवी को रुष्ट न करने की मान्यता के तहत वह अपने गाय-बच्छियों के साथ सूर्य निकलने के बाद ही यहां आते थे, और सूर्य के छुपने से पहले ही लौट जाते थे। ट्रेल ने स्थानीय लोगों की इन मान्यताओं के मद्देनजर ही न केवल स्वयं किसी अन्य अंग्रेज को इस स्थान के बारे में किसी को जानकारी नहीं दी, वरन स्थानीय लोगों को भी ऐसा न करने के प्रति आगाह किया। इस बात का जिक्र उन्होंने अपनी डायरी में करते हुए आशंका जताई थी कि अंग्रेज यहां आए तो इस स्थान की पवित्रता नहीं रह पाएगी। संभवतया इसी कारण बाद में अंग्रेज व्यवसायी पीटर बैरन को किसी ने इस स्थान का रास्ता नहीं बताया और अन्ततः वह 1839 में एक स्थानीय व्यक्ति के सिर पर पत्थर रखकर उसे नैनीताल पहुंचकर ही पत्थर उतारने की इजाजत देने की युक्ति के साथ ही यहां पहुंच पाया। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत कमिश्नर ट्रेल को ही नैनीताल के प्राचीन पाषाण देवी मंदिर की स्थापना का श्रेय भी देते हैं। वह बताते हैं कि स्कॉलेंड मूल के यह सभी अधिकारी स्वयं भी उत्तराखंड के पहाड़ों की तरह प्रकृति से जुड़ी संस्कृति व आध्यात्किता वाले थे, तथा यहां की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते थे। आगे कुमाऊं कमिश्नर रहे जेएच बेटन और हेनरी रैमजे भी स्कॉटिश थे, तथा वह भी यहां के लोगों की प्रकृति से जुड़ी लोक संस्कृति को बेहद महत्व देते थे। रैमजे के बारे में तो कहा जाता है कि उन्हें लोग प्यार से ‘राम जी’ भी कहा करते थे। वह नंदा देवी के भी अनन्य उपासक थे।

परंपरागत कानूनों को दी मान्यता

इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार स्कॉटिश मूल के कमिश्नरों ने ही उत्तराखंड के पहाड़ों पर मैदानी क्षेत्रों की तरह कठोर कानूनों को लागू नहीं किया, वरन यहां के परंपरागत कानूनों को कानूनी मान्यता दी। उदाहरण के लिए 1857 में पूरे देश को अंग्रेजों के खिलाफ पहले स्वतंत्रता संग्राम के लिए मजबूर करने वाले ‘आर्म्स एक्ट’ को यहां यह दलील देते हुए लागू नहीं किया गया कि यहां के लोग बेहद शांत-सरल है, और यहां अपराध नहीं होते। यहां तक दलील दी गई कि यहां के क्षत्रिय लोगों की शादी-ब्याह में हवा में बंदूकों से धमाके करने की परंपरा है, तथा वह तलवारें लेकर चलते हैं। अंग्रेज जहां देश भर में ‘फूट डालो और राज करो’ की कुरीति के लिए कुख्यात हुए, इसके उलट स्कॉटलेंड के अधिकारियों ने यहां ‘सामुदायिकता’ को बढ़ावा दिया। मैदानी क्षेत्रों की लेखपाल व्यवस्था से इतर पहाड़ों पर पटवारी व्यवस्था लागू की, तथा पटवारियों को ही कानूनी शक्ति दी, जिसे बाद के दौर में ‘गांधी पुलिस’ भी कहा गया। उस दौर में यहां गरीब परिवारों के द्वारा विवाह योग्य युवक-युवती को पानी के धारे (श्रोत) के पास ले जाकर बिना किसी प्रबंध के पानी के धारे को साक्षी बनाकर ‘पानी धारा विवाह’ कराने की परंपरा थी। इसके अलावा फौज की दूरी अथवा अन्य कारणों से विवाह के दिन घर न आ पाने वाले दूल्हों से युवतियों द्वारा उनकी जगह जल से भरे घड़े के साथ विवाह करने की ‘कंुभ विवाह’, तथा श्रत्रिय परिवारों में दूल्हों की अनुपस्थिति में उनकी तलवारों के साथ विवाह करने की परंपरा भी थी। इन परंपराओं को भी कानूनी मान्यता दी गई थी, तथा इन्हें लिखित रूप भी दिया था।

सामरिक दृष्टिकोण से अंग्रेजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण था उत्तराखंड

वह औपनिवेशिक वैश्विकवाद व साम्राज्यवाद का दौर था। नए उपनिवेशों की तलाश व अपना साम्राज्य फैलाने के लिए फ्रांस, इंग्लैंड व पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश समुद्री मार्ग से भारत आ चुके थे, जबकि रूस स्वयं को इस दौड़ में पीछे महसूस कर रहा था। कारण, उसकी उत्तरी समुद्री सीमा में स्थित वाल्टिक सागर व उत्तरी महासागर सर्दियों में जम जाते थे। तब स्वेज नहर भी नहीं थी। ऐसे में उसने काला सागर या भूमध्य सागर के रास्ते भारत आने के प्रयास किये, जिसका फ्रांस व तुर्की ने विरोध किया। इस कारण 1854 से 1856 तक दोनों खेमों के बीच क्रोमिया का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस पराजित हुआ, जिसके फलस्वरूप 1856 में हुई पेरिस की संधि में यूरोपीय देशों ने रूस पर काला सागर व भूमध्य सागर की ओर से सामरिक विस्तार न करने का प्रतिबंध लगा दिया। ऐसे में रूस के भारत आने के अन्य मार्ग बंद हो गऐ थे और वह केवल तिब्बत की ओर के मार्गों से ही भारत आ सकता था। तिब्बत से उत्तराखंड के लिपुलेख, नीति, माणा व जौहार घाटी के पहाड़ी दर्रों से आने के मार्ग बहुत पहले से प्रचलित थे। ऐसे में अंग्रेज रूस को यहां आने से रोकने के लिए पर्वतीय क्षेत्र में अपनी सुरक्षित बस्ती बसाना चाहते थे। दूसरी ओर भारत में पहले स्वाधीनता संग्राम की शुरूआत हो रही थी। मैदानों में खासकर रुहेले सरदार अंग्रेजों की नाक में दम किए हुऐ थे, और मेरठ गदर का गढ़ बना हुआ था। ऐसे में मैदानों के सबसे करीब और कठिन दर्रे के संकरे मार्ग से आगे का बेहद सुंदर स्थान नैनीताल उन्हें अपनी सुरक्षित बस्ती के लिए सबसे मुफीद नजर आया, जहां वह अपने परिवारों के साथ अपने घर की तरह सुरक्षित रह सकते थे। ऐसा हुआ भी। हल्द्वानी में अंग्रेजों व रुहेलों के बीच संघर्ष हुआ, जिसके खिलाफ तत्कालीन कमिश्नर हेनरी रैमजे नैनीताल से रणनीति बनाते हुए हल्द्वानी में हुऐ संघर्ष में 100 से अधिक रुहेले सरदारों को मार गिराने में सफल रहे। रुहेले दर्रा पार कर नैनीताल नहीं पहुंच पाये और यहां अंग्रेजों के परिवार सुरक्षित रहे।

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