नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग


kailash mansarovar

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से वार्ता कर कैलाश मानसरोवर के लिए सिक्किम के नाथुला दर्रे का रास्ता खुलवा दिया है, लेकिन सार्वभौमिक तथ्य है कि कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग कुमाऊं-उत्तराखंड के परंपरागत लिपुलेख दर्रे से ही है। कहते हैं कि स्वयं भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ इसी मार्ग से कैलाश गए थे। उत्तराखंड के प्राचीन ‘कत्यूरी राजाओं’ के समय में भी यही मार्ग कैलाश मानसरोवर के तीर्थाटन के लिए प्रयोग किया जाता था। पांडवों ने भी इसी मार्ग से कैलाश की यात्रा की थी तथा महान घुमक्कड़ साहित्यकार व इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन व सुप्रसिद्ध यात्री स्वामी प्रणवानंद भी इसी मार्ग से कैलाश गए थे। कैलाश मानसरोवर के इस परंपरागत यात्रा मार्ग के साथ हिमालय की सांस्कृतिक अस्मिताओं और उससे जुड़ी हिन्दू जैन, बौद्ध तथा तिब्बती आदि विभिन्न धर्मों की गौरवशाली परंपराओं का इतिहास भी जुड़ा है। ऋग्वैदिक आर्यों का मूल निवास स्थान उत्तराखंड हिमालय होने के कारण उनके कैलाश मानसरोवर आवागमन का भी यही मार्ग था। जैन धर्म के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ‘कैलाश’ से ही मोक्ष सिधारे थे, तथा उनके पुत्र भरत कैलाश मानसरोवर जाने के लिए ‘कुमाऊं’ के परंपरागत मार्ग को ही प्रयोग करते थे।
कहते हैं कि आर्यों ने लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व कुमाऊं-उत्तराखंड के रास्ते हिमालय की अति दुर्गम पर्वत घाटियों का अन्वेषण करते हुए कैलाश मानसरोवर तक यात्रा की थी, और विभिन्न नदियों के मूल स्रोतों की भी खोज की। इसी दौर में भगीरथ ने गंगा के उद्गम को ढूंढा। वशिष्ठ ने सरयू की और कौशिक ऋषि ने कोसी की खोज की। वैदिक काल के चक्रवर्ती राजा मानधता ने यहां तप किया था। पांडवों के दिग्विजय प्रयाण के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न आदि उपहार भेंट किए थे। आदि शंकराचार्य ने कैलाश पर्वत के समीप ही अपना शरीर त्याग किया था। कैलाश मानसरोवर चार धर्मो-हिन्दू, बौद्ध, जैन और तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोगों के लिए बेहद पवित्र स्थान है। कैलाश मानसरोवर की परंपरागत यात्रा उत्तराखंड के सीमावर्ती स्थान पिथौरागढ़ के धारचूला से शुरू होती है, और लिपुलेख दर्रे के जरिये 28 से 30 दिनों में चीन की सीमा में स्थित कैलाश मानसरोवर पहुंचती है। हजारों वर्षो से यह परंपरागत मार्ग कैलाश मानसरोवर यात्रा का शास्त्र सम्मत मार्ग भी माना जाता है। सदियों पुराने पुराणों में भी उत्तराखंड से होकर की जाने वाली कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रा के इसी मार्ग को ही धार्मिक मान्यता दी गयी है। इसी मार्ग से भगवान शिव मां नंदा से मिलने आए थे तथा इस मार्ग से तीर्थ यात्रियों को छोटा कैलाश और ‘ऊं’ पर्वत आदि के दर्शन भी होते हैं। महान इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन ने भी काठमांडु की बजाय इसी मार्ग को मानसरोवर यात्रा के लिए चुना था। आज भी कैलाश और मानसरोवर यात्रा पर भारत से जाने के लिये अनेक रास्ते हैं परन्तु कैलाश मानसरोवर के सुप्रसिद्ध यात्री स्वामी प्रणवानंद इनमें से कुमाऊं में स्थित ‘‘लिपुलेख’ दर्रे को ही सबसे सुगम एवं सुरक्षित मार्ग मानते हैं। कूर्माचल पर्वत से शुरू पौराणिक ग्रथों में हिमालय यात्रा से जुड़े सभी तीर्थस्थान कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा का हिस्सा माने गए हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार कुमाऊं को ‘मानसखंड’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह क्षेत्रा कैलाश मानसरोवर की परिक्रमा के अन्तर्गत आता है। ‘मानसखंड’ में कैलाश मानसरोवर को जाने और वापस आने दोनों यात्रा मागरे का जो भौगोलिक मानचित्र दिया गया है उसका शुभारम्भ उत्तराखंड में कुमाऊं स्थित कूर्मांचल पर्वत से ही होता है। धार्मिक दृष्टि से तीर्थस्थान की यात्रा वहीं से फलीभूत मानी जाती है जहां से उस यात्रा की सीमा शुरू होती है। ‘मानसखंड’ में कैलाश मानसरोवर की यात्रा का शुभारम्भ बताते हुए महर्षि दत्तात्रेय कहते हैं- उत्तराखंड में पर्वतराज हिमालय के पादतल में स्थित ‘कूर्मांचल’ नाम की पर्वतश्रेणी वाले मार्ग से ही तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू करनी चाहिए- ‘गन्तव्यं तत्रा राजर्षे ! यत्र कूर्मांचलो गिरिरू।’ उसके उपरान्त लोहाघाट स्थित कूर्मशिला का पूजन करके सरयू में स्नान करना चाहिए। उसके आगे जागेश्वर, पाताल भुवनेश्वर, रामगंगा, सीरा की पट्ठी स्थित पावन पर्वत, कनाली छीना के पास पताका पर्वत, काली गौरी संगम (जौलजीवी) चतुर्दंष्ट्र (चौंदास), व्यासाश्रम (ब्यांस), काली नदी का मूल, ब्यांस-चौंदास के बीच पुलोमन पर्वत आदि तीर्थस्थानों के दर्शन करते हुए गौरी पर्वत से नीचे उतर कर मानसरोवर के पवित्र जल में स्नान करना चाहिए। वापस लौटने के मार्ग को बताते हुए महर्षि दत्तात्रेय कहते हैं कि मानसरोवर की परिक्रमा करके रावणद (राक्षसताल) में स्नान करना चाहिए। तत्पश्चात् स्नेचरतीर्थ तथा ब्रताकपाल तीर्थ की पूजा-अर्चना करके निर्गमन करना चाहिए।
भारतीय परंपरा के अनुसार संसार में देवतात्मा हिमालय जैसा अन्य कोई पर्वत नहीं है क्योंकि यहां कैलाश पर्वत और मानसरोवर स्थित है। कैलाश पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 20 हजार फीट है। कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। यहां से कैलाश पर्वत के दर्शन ऐसे होते हैं, मानो भगवान शिव साक्षात् बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हों। कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। मानसरोवर संस्कृत के मानस (मस्तिष्क ) और सरोवर (झील) शब्द से बना है। मान्यता है कि ब्रह्मा ने अपने मन-मस्तिष्क से मानसरोवर बनाया है। पुराणों के अनुसार मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। समुद्रतल से 17 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित 120 किलोमीटर की परिधि तथा 300 फुट गहरे मीठे पानी की ऐसी अद्भुत प्राकृतिक झील इतनी ऊंचाई पर विश्व में किसी भी देश में नहीं है। शाक्त ग्रंथों के अनुसार, सती का हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह सरोवर बना। इसलिए 51 शक्तिपीठों में मानसरोवर की भी गणना की जाती है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर की धरती का स्पर्श कर लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति सरोवर का जल पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है। कैलाश पर्वत की परिक्रमा के दौरान एक किलोमीटर परिधि वाले गौरीकुंड के भी दर्शन होते हैं। इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां अन्य प्रसिद्ध सरोवर राक्षस ताल है। राक्षसों के राजा रावण ने यहां पर शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे रावणद भी कहते हैं।
शिव और शक्ति का धामकैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है जिसके प्रभाव से मन और हृदय दोनों निर्मल हो जाते हैं। स्थान-स्थान पर नदी प्रपातों के दूधिया झरने, हरियाली के अद्भुत नजारे तथा नवी ढांग में पर्वत शिर पर हिम नदियों से बने पर्वत जैसे प्राकृतिक चमत्कारों ने इस पावन स्थल को शिव और शक्ति का रहस्यमय लीला धाम बना दिया है। तीर्थयात्री जब पहली बार इन प्रकृति के अद्भुत दृश्यों का दर्शन करते हैं तो ऐसा लगता है कि वे प्रकृति और पुरु ष के रूप में शिव और उनकी अर्धागिनी पार्वती के साक्षात् दर्शन कर रहे हों। तब सहज ही भारतीय दर्शन के ब्रता और माया से जुड़े उन गूढ आध्यात्मिक और दार्शनिक सत्यों का उद्घाटन भी इस अनुपम कैलाश-मानसरोवर की यात्रा के दौरान होने लगता है जिसके अनुसार ‘ताश्वतरोपनिषद्’ में ‘माया’ को मूल प्रकृति और उसके अधिष्ठाता महेश्वर को ‘ब्रह्मा’ के रूप में निरूपित किया गया है ‘मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्’।
भारतीय परंपरा में पैदल मार्ग से कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा को पैदल करने का जो महात्म्य है वैसा महात्म्य वाहन से यात्रा करने का नहीं। धार्मिक दृष्टि से तीर्थयात्रा का प्रयोजन होता है अत्यन्त श्रद्धा भाव से प्रकृति परमेश्वरी की शरण में जाना। इसीलिए ये तीर्थस्थान सार्वजनिक स्थानों से दूर प्रदूषण फैलाने वाले मोटर वाहनों की पहुंच से बाहर ऊंचे पहाड़ों पर बने होते हैं ताकि श्रद्धालु जन पैदल चल कर प्राकृतिक वृक्षों-वनस्पतियों का निरीक्षण करते हुए मार्ग में पड़ने वाले सांस्कृतिक अवशेषों ऋषि-मुनियों के आश्रमों तपोवनों आदि के दर्शन कर सकें और नदी-सरोवरों में स्नान करके अपने आराध्य देवी-देवताओं के चरणों में आस्था के पुष्प चढ़ा सकें। शास्त्रों में कहा गया है कि जिनमें श्रद्धा नहीं है जो पाप कर्मो के लिए तीर्थसेवन करते हैं, जो नास्तिक हैं, जिनके मन में संदेह है, जो सैर-सपाटे और मौजमस्ती के लिए या किसी निहित स्वार्थ से तीर्थभ्रमण करते हैं- इन पांचों को तीर्थयात्रा का फल नहीं मिलता। सवारी तीर्थयात्रा का आधा फल हर लेती है। उसका आधा भाग छत्र और जूते इत्यादि धारण करने से समाप्त हो जाता है। व्यापार से तीन-चौथाई भाग नष्ट हो जाता है तथा प्रतिग्रह तीर्थयात्रा के सारे पुण्य को क्षीण कर देता है। पर चिन्ता का विषय है कि वर्तमान समय में तीर्थयात्रा के मायने ही बदलते जा रहे हैं। अब धार्मिक पर्यटन का मतलब हो गया है सैर-सपाटा या पिकनिक मनाना। धर्म के नाम पर उपभोक्तावादी बाजारवाद धार्मिक आस्था पर हावी हो चुका है।

कहीं से भी आएं, आना पड़ता है उत्तराखंड के ही करीब

नैनीताल। केएमवीएन के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन-डीके शर्मा कहते हैं कैलाश यात्रा के उत्तराखंड के अलावा अन्य भी कई मार्ग पहले से भी प्रचलित हैं। नेपाल के रास्ते भी वर्षों से बेहद आसान तरीके से महंगी लग्जरी-लैंड क्रूजर गाड़ियों और हवाई यात्रा के जरिए बेहद सुविधाजनक व आरामदेह तरीके से यात्रा होती है, लेकिन उत्तराखंड के रास्ते लिपुपास के मार्ग को ही पौराणिक मार्ग की मान्यता है। कहते हैं इसी रास्ते स्वयं महादेव शिव भी देवी पार्वती के साथ कैलाश गए थे। इस मार्ग से ही पैदल ट्रेकिंग करते हुए धार्मिक यात्रा का पूरा आनंद व दिव्य अनुभव प्राप्त होते हैं, साथ आदि या छोटा कैलाश कहे जाने वाले हिंदू धर्म के सबसे बड़े धार्मिक प्रतीक ‘ॐ” की बर्फ के पहाड़ पर प्राकृतिक रूप से बनी आकृति युक्त ॐ पर्वत के दर्शन भी होते हैं। श्री शर्मा इसके अलावा भी बताते हैं कि किसी भी अन्य मार्ग से यात्रा के आखिरी पड़ाव में उत्तराखंड के लिपुपास दर्रे के बेहद करीब चीन में पड़ने वाले तकलाकोट ही आना पड़ता है। नाथुला की यात्रा में भी यात्रियों को एक बार पूरा भारत देश हवाई मार्ग से पार कर पहले सुदूर अरुणांचल और वहां से कारों से पूरा नेपाल देश पार करते हुए तकलाकोट ही आना पड़ेगा, जो एक थकाने वाला अनुभव हो सकता है। इस लिहाज से भी उत्तराखंड के रास्ते होने वाली परंपरागत यात्रा को सर्वाधिक सरल माना जा रहा है।

चीन में भी बसता है एक भारत

-कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में मिलते हैं कई हिंदू धार्मिक स्थल
जी हां, भारत के धुर विरोधी और बड़ा खतरा बताये जाने वाले देश में भी एक भारत बसता है। देवों के देव कहे जाने वाले महादेव शिव के धाम कैलाश और मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन के क्षेत्र में ऐसे ही एक भारत के दर्शन श्रद्धालु तीर्थयात्रियों को अभिभूत कर देते हैं।
आज के एशिया महाद्वीप में जहां भारत एवं चीन आपस में प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं, लेकिन इससे इतर प्राचीन काल में दोनों के बीच काफी घनिष्ठ व प्रगाढ़ संबंध बताये जाते हैं। भारत के लुंबिनी (उप्र) में पैदा हुऐ गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित बौद्ध धर्म के श्रीलंका के साथ चीन में प्रसार इसका गवाह है। चीनी तीर्थयात्री फाह्यान ने भारत की सैर की। लेकिन इससे भी इतर चीन में हिंदू धर्म के सबसे बड़े आस्था केंद्र कैलाश-मानसरोवर के साथ ही और भी कई केंद्र मौजूद हैं, जिन्हें दो देशों में संयुक्त रूप से होने वाली और विश्व की सबसे पुरानी यात्राओं में शुमार कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान देखा जा सकता है। इस यात्रा की भारत में आयोजक संस्था कुमाऊं मंडल विकास निगम के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन एवं आधा दर्जन बार इस यात्रा पर तैयारियों का जायजा लेने जा चुके डीके शर्मा चीन में इस अनूठे भारत को याद कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं। श्री शर्मा बताते हैं कि चीन में यात्रियों को करीब आठ दिन बिताने होते हैं। भारत के अंतिम यात्रा पड़ाव लिपुपास से करीब तीन किमी आगे लिमिकारा या पांच किमी दूर पाला से चीनी वाहन यात्रियों को आगे की यात्रा कराते हैं। आगे पहला पड़ाव 14 किमी दूर तकलाकोट है, जहां चीन अब पॉली हाउस में भारतीय सब्जियां टमाटर, गोभी इत्यादि उगाता है। यह सब्जियां यात्रियों को घर जैसे भोजन का स्वाद तो दिलाती ही हैं, भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बहुतायत में पहुंचती और प्रयोग की जाती हैं। यहां चीन की नागरी टूरिस्ट कंपनी यात्रियों के आवास एवं भोजन का प्रबंध करती है। यात्रियों को भारतीय दाल, रोटी, सब्जी जैसे भोजन भी 80 के दशक से मिलने लगे हैं। आगे 80 किमी दूर कैलाश पर्वत के यात्रा पथ में दारचेन में तथा कीहू में मानसरोवर यात्रा पथ का अगला रात्रि विश्राम पड़ाव होता है। दारचेन से 22 किमी की दूरी पर स्थित डेराफू नाम के स्थान से कैलाश पर्वत के अलौकिक दर्शन होते हैं। खासकर चांदनी रात में श्वेत-धवल बर्फ से ढके विशाल कैलाश पर्वत का नजारा मनुष्य को किसी अन्य लोक जैसा पारलौकिक अनुभव कराता है। यहां से यात्री आठ-नौ किमी दूर 18,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित डोल्मा पास, छह किमी दूर जुटुल पुक व 15 किमी चलकर कुल 48 किमी का कैलाश पर्वत का चक्कर लगाकर वापस दारचेन पहुंचते हैं। डोल्मा पास में तारा देवी का पवित्र मंदिर है, जिसे नेपाल में उग्र तारा के रूप में पूजा जाता है, और उत्तराखंड में चंदवंशीय राजाओं की कुलदेवी नंदा देवी को कुछ मान्यताओं के अनुसार इस देवी से जोड़ा जाता है। डोल्मा पास में बौद्ध धर्मानुयायी तारा देवी के अनन्य भक्त हैं, वह बेहद ठंडे इस स्थान पर पैरों के बजाय लेट कर इस स्थान की यात्रा करते हैं। डोल्मा पास के पास ही गौरीकुंड तथा यमद्वार नाम के पवित्र धार्मिक स्थान भी हैं, जो हिंदूओं की धार्मिक आस्था के बड़े केंद्र हैं। यहां खुरजड़ या खोजड़नाथ नाम के स्थान पर भगवान राम, लक्ष्मण एवं सीता का मंदिर भी है, मसमें भी बौद्ध धर्म के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। कैलाश पर्वत के आगे के हिस्से में अष्टपाद नाम का पर्वत भी है, कई तीर्थयात्री समय निकालकर यहां भी पहुंचते हैं। मानसरोवर से भी दिखाई देने वाले इस स्थान की भी बड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। यहां बौद्ध धर्म का मंदिर गोम्फा भी स्थित है। उधर मानसरोवर के यात्रा पथ में कीहू से कूहू होते हुऐ मानसरोवर का चक्कर लगाते हुऐ 74 किमी चलना होता है। यहां सरोवर में राजहंस बतखें बेहद सुंदर लगती हैं। श्री शर्मा बताते हैं कि पूरा कैलाश-मानसरोवर यात्रा पथ अपने आप में अलौकिक है। यहां जगह-जगह पर तीर्थयात्रियों को अलौकिक एवं दिव्य अनुभूतियां होती हैं, और तीर्थयात्रियों का मन मानो पूरी तरह धुल जाता है।

नाथुला जैसी ही आसान होगी उत्तराखंड के रास्ते भी कैलाश मानसरोवर यात्रा

अब यात्रियों को 43 किमी ही चलना होगा पैदल, पैदल यात्रा पथ पर भी गब्र्याग से गुंजी और गुंजी से कालापानी के बीच जीपों से होगी यात्रा

नवीन जोशी नैनीताल। केंद्र सरकार के अरुणांचल प्रदेश नाथुला दर्रे से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नया सुगम, वाहनों का यात्रा पथ खोल दिए जाने को उत्तराखंड ने चुनौती की तरह लिया है। राज्य के मौजूदा पौराणिक एवं परंपरागत मार्ग की प्रतिस्पर्धा में दुर्गम पैदल पथ के कारण की दुश्वारियों को दूर करने के बाबत उत्तराखंड ने प्रयत्न शुरू कर दिए हैं। अब इस यात्रा में यात्रियों को भारतीय भूभाग में 43 किमी ही पैदल चलना पड़ेगा, जबकि इस मार्ग पर 85 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की घोषणा के बाद कुमाऊं मंडल विकास निगम इस यात्रा की पैदल दूरी कम करने में जुट गया है।

Dhiraaj Garbyalयात्रा मार्ग को और आसान करने के लिए केएमवीएन को सरकार से 25 करोड़ रुपये इस यात्रा मार्ग को और अधिक सरल व आसान बनाने के लिए मिले हैं, उसका भी सदुपयोग किया जा रहा है। -केएमवीएन के एमडी धीराज गर्ब्याल

उल्लेखनीय है कि गत दिवस नैनीताल में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बताया था कि यात्रा के पैदल मार्ग पर बन चुकी सड़क के हिस्सों पर जीप चलाने की घोषणा की थी। इस पर शासन व निगम स्तर पर पहल भी शुरू हो गई है। निगम को शासन ने कैलास यात्रा मार्ग के सुधार के लिए 25 करोड़ रुपये दिये हैं और निगम ने बीच की सड़क के हिस्सों में हेलीकॉप्टर से जीपें उतारने के प्रयास शुरू कर दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि 1700 किमी लंबी कैलास मानसरोवर यात्रा देश ही नहीं दुनिया की प्राचीनतम और दो देशों की सीमाओं में होने वाली अनूठी धार्मिक यात्रा है। वर्ष 1981 से केएमवीएन द्वारा उत्तराखंड के रास्ते कराई जा रही यात्रा में अब तक 388 दलों में 13,533 तीर्थयात्री शिव के धाम जा चुके हैं। उधर, केंद्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश के नाथुला दर्रे से कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए नया सुगम, वाहनों का यात्रा पथ खोले जाने को उत्तराखंड ने चुनौती की तरह लिया है। राज्य के मौजूदा पौराणिक व परंपरागत मार्ग की प्रतिस्पर्धा में दुर्गम पैदल पथ की दुश्वारियों को दूर करने के बाबत सरकार ने प्रयत्न शुरू कर दिये हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गत दिवस मुख्यालय में बताया था कि परंपरागत मार्ग के पैदल पथ में जहां-जहां संभव होगा, सड़क बनाने की कोशिश की जाएगी और जहां बीच-बीच में टुकड़ों में सड़क बन चुकी है, वहां जीपों से यात्रा कराई जाएगी। इस पर अमल करते हुए केएमवीएन ने जो होमवर्क शुरू किया है। उसके अनुसार अब यात्री शुरुआती यात्रा मार्ग पर नारायण आश्रम के बजाय 20 किमी आगे गाला तक वाहन से जा सकेंगे। आगे गाला से बूंदी 18 किमी और बूंदी से गर्ब्यांग आठ किमी पैदल चलने के बाद गर्ब्यांग से 11 किमी गुंजी तक एक जीप और गुंजी से कालापानी तक नौ किमी दूसरी जीप से पार कर पाएंगे। इससे करीब 40 किमी की पैदल दूरी कम हो जाएगी और आगे कालापानी से नाभीढांग नौ व नाभीढांग से भारतीय सीमा के आखिरी पड़ाव लिपूपास तक आठ किमी मिलाकर भारतीय क्षेत्र में कुल 43 किमी ही पैदल चलना पड़ेगा। इस यात्रा व पर्यटन पर फोकस कर चल रहे केएमवीएन के नए एमडी धीराज गर्ब्याल ने बताया कि सरकार से इस यात्रा मार्ग को और अधिक सरल व आसान बनाने के लिए 25 करोड़ रुपये मिले हैं, उसका भी सदुपयोग किया जा रहा है।

उत्तराखंड की परम्परागत सांस्कृतिक एवं धार्मिक यात्रा है कैलास मानसरोवर यात्रा : हरीश रावत

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए अन्य मार्ग खोले जाने की केंद्र की पेशकश का विरोध किया है। इस संबंध में मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड की चिंता से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को अवगत कराते हुए कहा है कि यात्रा को सुगम बनाने के लिए राज्य सरकार नई योजना बनाने जा रही है। इसमें सड़क मार्गों का निर्माण कर ट्रैकिंग रूट को कम करने और हवाई सेवा शुरू कर यात्रा की अवधि को कम तथा सुगम बनाया जा रहा है। मंगलवार (9.10.2014) को नई दिल्ली संसद भवन में मुख्यमंत्री ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात कर कैलास मानसरोवर यात्रा को उत्तराखंड से ही संचालित किए जाने की बात कही। सीएम ने कहा कि यह यात्रा उत्तराखंड की परम्परागत सांस्कृतिक एवं धार्मिक यात्रा है। माना जाता है कि भगवान शिव इसी मार्ग से मां नंदादेवी से विवाह करने आये थे। मां नंदा उत्तराखंड की बेटी है। इसी मार्ग से अनादिकाल से यह यात्रा संचालित होती रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कैलास मानसरोवर यात्रा की अवधि 4-6 दिन कम करने के लिए ट्रैकिंग मार्ग पर भी काम किया जा रहा है। यात्रा मार्ग पर जहां-जहां नई सड़कें बन रही हैं, वहां जीप से यात्रा कराई जाएगी। साथ ही बारिश के मौसम में हेली सर्विस भी उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए कार्य योजना बनाई जा रही है। इसके अतिरिक्त प्रदेश सरकार एक और योजना बना रही है। पिथौरागढ़ में शीघ्र ही हवाई सेवाएं शुरू होने वाली हैं। यदि केंद्र सरकार उसके किराये में सब्सिडी देती है तो उत्तराखंड सरकार यात्रियों को नाथुला से बेहतर विकल्प दे सकती हैं। इसके तहत पिथौरागढ़ से नाभिढांग तक हेलीकॉप्टर से यात्रा की जा सकेगी। उत्तराखंड सरकार दोनों विकल्पों पर काम कर रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड इस सभ्यता की धरोहर की रक्षा के लिए संकल्पित है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग ऐतिहासिक पौराणिक मार्ग है। इसके लिए उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से कैलास मानसरोवर यात्रा को उत्तराखंड के इसी मार्ग से संचालित किये जाने का अनुरोध किया है।

राजनेताओं की जिंदगी केवल पांच वर्ष की

नैनीताल। अपनी चुटीली टिप्पणियों के लिए प्रसिद्ध सीएम हरीश रावत ने राजनेताओं के लिए टिप्पणी की कि उनकी उम्र केवल पांच वर्ष की होती है। इसलिए उन्हें जो कुछ कार्य करने होते हैं, इसी अवधि में पूरे करने होते हैं। प्रतियोगिता में विजेता-उपविजेता से पीछे रह जाने वाले खिलाड़ियों की तुलना उन्होंने खुद से की, इस पर भी लोगों की हंसी छूट पड़ी।

सरकार से टैक्स में छूट नहीं ढांचागत सुविधाएं मांगें

नैनीताल। एक गंभीर एवं मार्गदर्शक राजनेता के रूप में सीएम हरीश रावत ने होटलियर्स व अन्य को सलाह दी कि वह सरकार से टैक्सों में छूट न मांगें वरन बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर यानी ढांचागत सुविधाओं की मांग करें। कहा कि समर्थ लोगों को राष्ट्र व प्रदेश की प्रगति के लिए और अधिक टैक्स देने के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि टैक्स की धनराशि से ही राष्ट्र-प्रदेश को विकास के लिए धन प्राप्त होता है। उन्होंने प्रदेश के गांवों में पशुओं के चारे की समस्या को दूर करने के लिए अपनी नाप भूमि में चारा प्रजाति के पेड़ लगाने पर सरकार की ओर से प्रति पेड़ 300 रुपए देने की योजना की जानकारी दी। हड़ताली मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों पर हाईकोर्ट के एस्मा लगाने के आदेश पर उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों को समझना चाहिए। नहीं तो सरकार को अपने कर्तव्य का पालन करना पड़ेगा।

उत्तराखंड पर नाथुला मार्ग से यात्रा का नहीं पड़ेगा प्रभाव

कैलाश मानसरोवर यात्रा उत्तराखंड के रास्ते 60-60 के 18 दलों में कुल 1280 यात्रियों के कैलास जाने की अनुमति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा
नवीन जोशी, नैनीताल। अरुणाचल प्रदेश के नाथुला पास से कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग खुलने के बावजूद उत्तराखंड के रास्ते होने वाली यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उत्तराखंड के रास्ते 60-60 लोगों के 18 दलों में कुल 1280 यात्रियों के कैलास जाने की अनुमति मिलेगी। गत दिवस (05.02.2015) विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा के दौरान नाथुला से नये यात्रा मार्ग खोलने को लेकर हुए समझौते से उत्तराखंड से होने वाली यात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

कैलास मानसरोवर यात्रा कराने वाले कुमाऊं मंडल विकास निगम के मंडलीय प्रबंधक पर्यटन डीके शर्मा ने भारतीय विदेश मंत्रालय से बातकर इस बारे में स्थिति स्पष्ट की और खुलासा किया कि उत्तराखंड से पहले ही 60- 60 के 18 दलों में कुल 1280 यात्रियों को कैलास मानसरोवर की यात्रा पर ले जाने की अनुमति है वह जारी रहेगी। इसके साथ ही निगम के पास अपने पड़ावों पर हर दल में इतने यात्रियों और अन्य सहयोगी स्टाफ के लिए सुविधा उपलब्ध रहती है। यह अलग बात है कि अब तक वर्ष दर वर्ष यात्रियों की संख्या बढ़ने के बावजूद पिछले वर्ष सर्वाधिक 910 यात्रियों के इस धार्मिक यात्रा पर जाने का रिकार्ड बना है। वर्ष 1981 से अब तक इस मार्ग से 388 दलों में केवल 13,534 तीर्थयात्री ही शिव के धाम जा चुके हैं। यानी अब तक कभी भी इस यात्रा मार्ग से क्षमता के अनुसार पूरी संख्या में यात्री नहीं जा पाए हैं और जितने लोग गए हैं, वह संख्या भी देश की सवा अरब की जनसंख्या की तुलना में नगण्य ही कही जा सकती है, लिहाजा निगम के अधिकारी भी अनौपचारिक तौर पर विास जता रहे हैं कि नाथुला जैसे अन्य और मार्ग भी खुलने से यात्रा पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। वास्तविक रूप से पुण्य प्राप्त करने के लिए तीर्थयात्रा पर जाने वाले लोग पूर्व की तरह ही पुरातन मार्ग से यात्रा करते रहेंगे।

नाथुला मार्ग खुलने का उत्तराखंड से कैलाश यात्रा पर नहीं पड़ा प्रभाव, बना दूसरा कीर्तिमान

नैनीताल। 1981 से कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा संचालित कैलाश मानसरोवर यात्रा में इस वर्ष कुल 783 यात्री शामिल रहे हैं, जो इस यात्रा का दूसरा कीर्तिमान है। इससे पूर्व पिछले वर्ष 2014 में 910 यात्रियों का कीर्तिमान बना था, जबकि इससे पूर्व 2013 में भीषण आपदा की वजह से दो दलों में केवल 106 यात्री ही यात्रा पर जा पाए थे, जबकि केवल एक दल के यात्री ही यात्रा पूरी कर पाए थे। इस वर्ष की बात करें तो यात्रा पर गए 783 यात्रियों में से नौ यात्री निजी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से यात्रा पूरी नहीं कर पाए। एक महिला यात्री की कैलाश मानसरोवर के दर्शन करने के उपरांत लौटते हुए मृत्यु भी हो गई थी। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से सिक्किम के नाथुला दर्रे से हवाई व सड़क मार्ग से यात्रा की सुविधा युक्त दूसरा मार्ग खुला था, इसका खास प्रभाव उत्तराखंड की अपेक्षाकृत कठिन परंतु पौराणिक मार्ग से आयोजित होने वाली यात्रा पर नहीं पड़ा है। दोनों मार्गों से यात्रा के लिए कुल2300 के करीब आवेदन आए थे, जिनमें से करीब 1,300 ने उत्तराखंड के मार्ग को पहली प्राथमिकता दी थी । इस वर्ष सिक्किम के रास्ते करीब 240 यात्रियों ने पहली बार कैलाश मानसरोवर की यात्रा की।

मूलतः यहाँ देखें-राष्ट्रीय सहारा 

यह भी देखेंः

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4 responses to “नाथुला नहीं, कुमाऊं-उत्तराखंड से ही है कैलाश मानसरोवर का पौराणिक व शास्त्र सम्मत मार्ग

  1. अभी तक कहाँ सो रही थी सरकार ?
    वैकल्पिक मार्ग की बात आते ही यात्रियों की सुध आ गयी वरना अभी तक सीलन और बदबू से भरे स्लीपिंग बैग और कठिन डगर…
    अभी तक कहाँ कान मे तेल डालकर सोयी थी…

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