::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद


Kakadighat

Kakadighat

-नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट में ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे स्वामी विवेकानंद को हुऐ थे अणु में ब्रह्मांड के दर्शन -स्वामी विवेकानंद व देवभूमि का संबंध तीन चरणों, यानी उनके नरेंद्र होने से लेकर स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनने तक का था

नवीन जोशी, नैनीताल। उस दौर में सपेरों के देश माने जाने वाले भारत को दुनिया के समक्ष आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रवर्तित करने वाले युगदृष्टा राजर्षि विवेकानंद को आध्यात्मिक ज्ञान नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट नाम के स्थान पर प्राप्त हुआ था। यानी सही मायनों में बालक नरेंद्र के राजर्षि विवेकानंद बनने की यात्रा देवभूमि के इसी स्थान से प्रारंभ हुई थी, और काकड़ीघाट ही उनका ‘बोध गया’ था। यहीं उनके अवचेतन शरीर में अजीब सी सिंहरन हुई, और वह वहीं ‘बोधि वृक्ष’ सरीखे पीपल का पेड़ के नीचे ध्यान लगा कर बैठ गऐ। इस बात का जिक्र करते हुऐ बाद में स्वामी जी ने कहा था, यहां (काकड़ीघाट) में उन्हें पूरे ब्रह्मांड के एक अणु में दर्शन हुऐ। यही वह ज्ञान था जिसे 11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित धर्म संसद में स्वामी जी ने पूरी दुनिया के समक्ष रखकर विश्व को चमत्कृत करते हुए देश का मानवर्धन किया। सम्भवतः स्वामी जी को अपने मंत्र ‘उत्तिष्ठ जागृत प्राप्यवरान्निबोधत्’ के प्रथम शब्द ‘उत्तिष्ठ’ की प्रेरणा भी अल्मोड़ा में ही मिली थी। उन्होंने हिन्दी में अपना पहला भाषण राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में दिया था। 

Rashtriya Sahara, 12th January 2015

स्वामी विवेकानंद व देवभूमि का संबंध तीन चरणों यानी उनके नरेंद्र होने से लेकर स्वामी विवेकानंद और फिर राजर्षि विवेकानंद बनने तक का था। वह चार बार देवभूमि आऐ। उनकी पहली आध्यात्मिक यात्रा अगस्त 1890 में एक सामान्य साधु नरेंद्र के रूप में गुरु भाई अखंडानंद के साथ नैनीताल में प्रसन्न भट्टाचार्य के घर पर छह दिन रूककर वे अल्मोड़ा की तरफ़ चल पड़े। जनपद के काकड़ीघाट में एक पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें यह आत्मज्ञान प्राप्त हुआ कि कैसे समूचा ब्रह्मांड एक अणु में समाया हुआ है।स्वामीजी ने उस दिन की अनुभूति की बात बांग्ला में लिखी, ” आमार जीवनेर एकटा मस्त समस्या आमि महाधामे फेले दिये गेलुम !’ यानी ‘आज मेरे जीवन की एक बहुत गूढ़ समस्या का समाधान इस महा धाम में प्राप्त हो गया है !’ यहां से आगे चलते हुए वह अल्मोड़ा की ओर बढ़े। कहते हैं कि अल्मोड़ा से पूर्व वर्तमान मुस्लिम कब्रिस्तान करबला के पास खड़ी चढ़ाई चढ़ने व भूख-प्यास के कारण उन्हें मूर्छा आ गई। वहां एक मुस्लिम फकीर ने उन्हें ककड़ी (पहाड़ी खीरा) खिलाकर ठीक किया। इस बात का जिक्र स्वामी जी ने शिकागो से लौटकर मई 1897 में दूसरी बार अल्मोड़ा आने पर किया। अल्मोड़ा में वह लाला बद्रीश शाह के आतिथ्य में रहे। यह स्वामी विवेकानंद का राजर्षि के रूप में नया अवतार था। इस मौके पर हिंदी के छायावादी सुकुमार कवि सुमित्रानंदन ने कविता लिखी थी:

‘मां अल्मोड़े में आऐ थे जब राजर्षि विवेकानंद

तब मग में मखमल बिछवाया था, दीपावली थी अति उमंग”

स्वामी जी अल्मोड़ा से आगे चंपावत जिले के मायावती आश्रम भी गऐ थे, जहां आज भी स्वामी जी का प्रचुर साहित्य संग्रहीत है। अल्मोड़ा में स्वामी जी के गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम से मठ व कुटीर आज भी मौजूद है। बाद में उनके भाषणों का संग्रह ‘कोलंबो से अल्मोड़ा तक” नाम से प्रकाशित हुआ था। यहां काकड़ीघाट में आज भी उन्हें ज्ञान प्रदान कराने वाला वह बोधि वृक्ष सरीखा पीपल का पेड़ तथा आश्रम आज भी मौजूद है। वहीं 1898 में की गई अपनी तीसरी यात्रा के दौरान अल्मोड़ा में उन्होंने अपनी मद्रास से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘प्रबुद्ध भारत” का प्रकाशन मायावती आश्रम से करने का निर्णय लिया था।अल्मोड़ा के मुख्य नगर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुर्गा के मंदिर-कसारदेवी की गुफा में वह ध्यान और साधना करते थे। देवलधार और स्याही देवी भी उनके प्रिय स्थल थे। उन्होने यहां कई दिनों तक एक शिला पर बैठ कर साधना की।

काकड़ीघाट स्थित स्वामी विवेकानंद के ‘बोधि वृक्ष” के संरक्षण की उम्मीद बनी

नैनीताल। स्वामी विवेकानंद को 1890 में अपनी देवभूमि की पहली यात्रा में नैनीताल जनपद के काकड़ीघाट स्थित शिवालय में पीपल का वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। हमने गत 21 जनवरी को उनके जन्म दिन युवा दिवस के मौके पर स्वामी विवेकानंद को गौतम बुद्ध की तरह ज्ञान दिलाने वाले इस स्थान को ‘बोध गया” एवं इस पीपल वृक्ष को ‘बोधि वृक्ष” के रूप में संरक्षित किए जाने की आवश्यकता जताई थी। इस पर पहल हुई है। बतौर पंतनगर विवि के ‘इंडियन काउंसिल फॉर फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन” में विशेषज्ञ की हैसियत से शामिल कुलपति कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. एचएस धामी ने काउंसिल को बतौर इस पीपल वृक्ष को ‘बोधि वृक्ष” के रूप में संरक्षित किए जाने की संस्तुति की है। प्रो. धामी ने यह जानकारी देते हुए उम्मीद जताई कि उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाएगा। बताया कि ‘इंडियन काउंसिल फॉर फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन” पूर्व में गौतम बुद्ध के “बोधि वृक्ष” को संरक्षित करने का कार्य कर चुका है।

स्वामी विवेकानंद के उत्तरांचल यात्रा के चार चरण: 

  1. अगस्त से सितम्बर 1890 जब वे एक अज्ञात सन्यासी नरेंद्र के रूप में यहाँ आए
  2. मई से अगस्त 1897 जब वे दक्षिण से उत्तर की यात्रा के बाद आए
  3. मई से जून 1898 जब वे कश्मीर हिमालय की यात्रा के क्रम में यहाँ आए
  4. दिसंबर से जनवरी 1901  जब वे अद्वैत आश्रम मायावती की यात्रा पर आए 

यह भी पढ़ें : देवभूमि के कण-कण में देवत्व: स्वामी विवेकानंद का ‘बोध गया’ : काकड़ीघाट

Advertisements

5 responses to “::युवा दिवस 12 जनवरी, 152वीं जयंती पर पर विशेष: नैनीताल से ही नरेंद्र बना था शिकागो का राजर्षि विवेकानंद

  1. पिंगबैक: उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी-रत्नगर्भा अल्मोड़ा | नवीन जोशी समग्र·

  2. पिंगबैक: विभिन्न विषयों पर अधिक पसंद किए गए ब्लॉग पोस्ट | हम तो ठैरे UTTARAKHAND Lovers, हम बताते हैं नैनीताल की खिड़की स·

  3. पिंगबैक: उत्तराखंडी ‘बांडों’ के कन्धों पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी – नवीन समाचार : हम बताएंगे नैन·

  4. पिंगबैक: इतिहास के झरोखे से कुछ महान उत्तराखंडियों के नाम-उपनाम व एतिहासिक घटनायें – नवीन समाचार : हम बता·

  5. पिंगबैक: विभिन्न विषयों पर पुराने अधिक पसंद किए गए पोस्ट – नवीन समाचार : नवीन दृष्टिकोण से समाचार·

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s